Tuesday, January 24, 2012

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आंच साहित्यकारों और कलाकारों के मामले में ही क्यों आती है?

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लगातार धमकी की ख़बरों के बाद सलमान रुश्दी नहीं आये. अब कार्यक्रम के अंतिम दिन वीडियो कोंफ्रेंसिंग के ज़रिये उनसे बात करने की घोषणा की गई. खबर है कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन की उनके बारे में की जा रही पूछताछ से कयास लगाये जा रहे हैं कि शायद एन-वक्त पर यह कार्यक्रम भी खटाई में पड़ जायेगा.आश्चर्य है कि कोई व्यक्ति ऐसा क्या बोलता या लिखता है जिससे बलवा होने का अंदेशा हो जाता है? कोई राजनेता ऐसा कुछ क्यों नहीं बोल पाता जिस पर यकीन करके लोग उसे गंभीरता से लें. यदि किसी की बात को लोग इस पार या उस पार गंभीरता से लेते हैं तो उसके वजूद को सत्ता आसानी से क्यों नहीं पचा पाती? दुनिया भर से इतने लोग आकर अपनी बात कह रहे हैं, तो रुश्दी की बात सुन कर ही जनता क्यों कुपित हो जाएगी?और यदि हो जाएगी तो वह सबसे बड़ा वक्ता साबित होगा या नहीं? यदि ऐसा कोई है तो आयोजक उसे सम्मान क्यों न दें? क्या आयोजकों का अभीष्ट ऐसे लोगों का मजमा या जमघट लगाना है जिनकी बातों से कहीं कुछ न हो?    

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