Thursday, August 18, 2011

सरकार माने सरकार,चाहे देसी या फिरंगी

न  जाने हमारे देश की हवा में ही ऐसा क्या है कि विजय-दशमी नज़दीक आते ही कहीं-न-कहीं से राम-रावण आकर रामलीला मैदान में आमने-सामने हो ही जाते हैं.जब कोई मजदूर या कुली बोझा उठाता है तो वह बोझ को कंधे पर लेने के लिए "झुकता"है.पुराने ज़माने में जब दास प्रथा थी,शोषक-वर्ग दास पर तरह-तरह से ज़ुल्म करता था.ज़मीन पर लोटपोट हुए सेवक पर मालिक द्वारा हंटर बरसाए जाते थे,जिस से दास घबरा कर उठ खडा होने की कोशिश में घुटनों के बल खड़ा हो जाता था.इसे "घुटने टेकना"भी कहते थे.इसका अर्थ यह होता था कि मालिक जो भी कह रहा है,वह सेवक को स्वीकार है.
जब कोई तेज़ी से जाती गाड़ी एकाएक वापस उसी मार्ग पर लौट पड़ती है तो इसे देहाती भाषा में पलटी मारना और सभ्य भाषा में "यू टर्न"लेना कहते हैं.
झुकना,घुटने टेकना,पलटी मारना यह सब 'बॉडी लैंग्वेज़'की प्रक्रिया है.किसकी?
किसी ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे की नहीं,माननीय सरकार की.
वर्षों पहले जब किरण बेदी दिल्ली की तिहाड़ जेल को तरह-तरह से आदर्श रहवास बनाने की कवायद में जुटी थीं,तब शायद वे भी नहीं जानती थीं कि इस प्रख्यात कैद खाने में एक दिन वीवीआईपियों का तांता  लग जायेगा.इसी में मसीहा इसी में मक्कार एक साथ ठूंसे जायेंगे.
लगता है कि सरकारों को अक्ल के पीछे लट्ठ लेकर दौड़ने का दैवीय वरदान प्राप्त है.
देश के लगभग हर शहर में कभी रामलीला मैदान यह सोच कर बनाए गए थे कि इस देश में लीला युग-युगों  तक होती रहेगी.

2 comments:

  1. अक्ल के पीछे लट्ठ? आजकल यह तो लट्ठों का पूरा खेत ही लिये घूम रहे हैं।

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  2. achchhi baat yah hai ki latth sukhi lakdiyon ka hi hota hai. aur inka poora khet lekar ghoomne wale jeb me hi maachis bhi rakhe ghoom rahen hain. lagta hai apna itihaas ye khud likhenge.

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