Tuesday, August 9, 2011

प्रकृति हमारी जीवन शैली में आत्मा की तरह घुस आई है

प्रकृति जो भी बनाती है बहुत सारा बनाती है, उसमे से "उचित" या उपयुक्त को रखती है, बाक़ी सारा मिटा देती है, यही डार्विन ने भी कहा था. 
पर आज लगता है कि प्रकृति संदेह के घेरे में है.जो बच रहा है, वही उपयुक्त नहीं है.जो जा रहा है वह सारा अनुचित नहीं है.हो सकता है कि कहीं कोई डार्विन इस पर काम कर रहा हो, और जल्दी ही हमें बताये कि ऐसा क्यों हो रहा है?

2 comments:

  1. samay chakra badal raha hai prakrti ke jeevan me manav hastakshep aa gaya hai to prakarti kyun nahi badlegi.

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  2. bilkul theek, aap is pariwartan ke liye jaisa sahaj sweekar dikha rahi hain, yahi wakt kee nabz pahchananaa hai. yahi samay se aage chalna bhi.

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