Saturday, March 12, 2011

लम्हों की खता और सदियों का रोना

दो पडौसी थे। वैसे तो दोनों लगभग समान स्तर के थे- कमाई भी बराबर, कामकाज भी एक सा, पर एक अंतर था। एक के बच्चे बड़े समझदार, ईमानदार और बुद्धिमान थे मगर दूसरे के बच्चे शरारती, पढ़ाई से जी चुराने वाले, उधमी।दोनों पडौसी जब भी मिलते, किसी न किसी बात पर बच्चों का ज़िक्र आ ही जाता।समझदार बच्चों के माता-पिता तो फिर भी कुछ न कहते पर शरारती बच्चों के माता-पिता को मन ही मन ऐसा लगता रहता, कि इनके बच्चे देखो, कितने होशियार हैं। आखिर उनकी ईर्ष्या ने एक तरकीब निकाल ही ली।अब वे जब भी आते, खुद अपने बच्चों का ज़िक्र न करते, बल्कि उन्होंने अपने किसी दूर के रिश्तेदार के बच्चों का ज़िक्र करना शुरू कर दिया। संयोग से इन दूर के रिश्तेदार के बच्चे भी होशियार और समझदार थे। बस, अब उन्हें अपने पडौसियों को बार-बार नीचा दिखाने का बहाना मिल गया। वे जब भी आते रिश्तेदार के बच्चों की तारीफ के पुल बांध-बांध कर अपने पडौसियों के सामने अपना जी हल्का करते रहते। वे अपने खुद के बच्चों की नालायकी को छिपाने का तरीका तलाशने में ऐसे खो गए कि धीरे-धीरे अपने बच्चों से दूर होते चले गए।समझदार पडौसी उनकी चेष्टाओं का मज़ा मंद-मंद मुस्करा कर लेते रहे।
कई बार हमारे भीतर कीचड़ का ऐसा ही ज्वार पनप जाता है। हम दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में और भी रसातल में जाते चले जाते हैं। यदि हम अपनी ईर्ष्या पर काबू पाने में सफल नहीं होते तो एक दिन हमारी स्थिति उस पोंगा-पंडित की तरह हो जाती है जो दूसरे की थाली गन्दी करने के लिए उसमे विष्ठा खाने को उद्यत हो जाता है।यह स्थिति केवल आदमी की ही नहीं, बल्कि समाजों या देशों तक की भी हो जाती है। और ऐसा जब देशों के मामलों में होता है तो लम्हों की खता सदियों तक रुलाती है।

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