Wednesday, March 2, 2011

छोटा-बड़ा कोई तय नहीं करता

क्या सर्वश्रेष्ठ में कोई बुराई या कमी नहीं होती? क्या अमेरिका की कोई ऐसी बात नहीं है जो अच्छी न हो ?नहीं, ऐसा तो कभी भी नहीं होता कि किसी देश की सभी बातें अच्छी ही हों। ऐसे देशों की एक कमी तो यही हो जाएगी कि उनमे कोई बुराई नहीं है। अमेरिका के नज़रिए को यदि आप समय-समय पर थोड़ा गौर से देखते-पढ़ते रहें हों तो आपको यह अवश्य पता होगा कि यहाँ एक सीमित सहिष्णुता है। सीमित सहिष्णुता को हम धैर्य की कमी भी कह सकते हैं। यह देश बहुत लम्बे समय तक किसी घटनाक्रम को उदासीनता से देखता नहीं रह सकता। यह प्राय प्रतिक्रिया देने में देर भी नहीं करता। प्रतिक्रिया देने में कंजूसी करे, यह तो हो ही नहीं सकता। विश्व घटनाक्रम में दिलचस्पी रखने वाले भली-भांति जानते हैं कि दुनिया के किसी भी कौने में कुछ भी घटित होते ही तमाम दुनिया का मीडिया सबसे पहले अमेरिका की ओर ही देखता है।यहाँ तक कि कभी-कभी तो उस देश के विचारों से भी ज्यादा तरजीह अमेरिका की प्रतिक्रिया को दी जाती है, जहाँ वह घटना घटी हो अथवा जो देश उस घटना से सीधे तौर पर जुड़े हों। और शायद अमेरिका ने भी ऐसे में किसी बात पर प्रतिक्रिया देने में देर करके इंतजार करती प्रेस को कभी निराश नहीं किया।प्रतिक्रिया आती है, और तुरंत ही नहीं बल्कि बिना किसी लागलपेट के आती है, पूरी बेबाकी से आती है। यहाँ तक कि कभी-कभी तो प्रतिक्रिया इस तरह आती है जैसे वहां कूटनीति का कोई वजूद न हो।
यहाँ कोई यह भी कह सकता है कि बहुत से मसले तो ऐसे हैं जिन पर अमेरिका अभी तक स्पष्ट नहीं है। भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर यह बात कही जा सकती है। शायद एशिया में चीन की भूमिका को लेकर भी कुछ लोगों को यही लग सकता है। ऐसे कुछ मामलों में अमेरिकी बयान तात्कालिकता या अवसर के प्रभाव में आते दिखे हैं।लेकिन ऐसी बातों को अपवाद की तरह न देख कर हम फ़िलहाल इस तरह सोचें कि यह अंदाज़ आप कमी के रूप में मानेंगे या खूबी की तरह।

2 comments:

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