Saturday, March 5, 2011

बड़े भी सीखते हैं छोटों से

क्या आपने कभी किसी बड़े को किसी छोटे से कुछ सीखते हुए देखा है? ज़रूर देखा होगा, क्योंकि न तो सीखने की कोई उम्र होती है और न सिखाने की ।यह भी तो कहीं नहीं लिखा कि बड़े सब अच्छी बातें जानते हैं। फिर यह भी कहाँ लिखा है कि सब अच्छी बातें ही सीखना चाहते हैं। छोड़िये, इस चर्चा से भी क्या लाभ?
मुझे याद पड़ता है कि कुछ साल पहले ही वह ज़बरदस्त आंधी शुरू हुयी थी जिसे हम लोग ' ग्लोबलाइजेशन ' के नाम से पुकारते हैं।इस दौर में दुनियावी विपणन अर्थात मार्केटिंग के बड़े आक्रामक तरीके बाज़ार में आये। एक के साथ एक मुफ्त, यह लेने पर वह फ्री, आदि-आदि। लेकिन मार्केटिंग का एक तरीका, जहाँ तक मैं समझता हूँ खालिस भारतीय ही है। वह है - बारगेनिंग का तरीका। दुकानदार कहता है कि यह चीज़ बीस रुपये की है , हम कहते हैं कि नहीं, पंद्रह में देदो। वह कहता है कि अच्छा चलो, अठारह देदो। हम कहते हैं कि बस, सत्रह देंगे। वह मान जाता है , और हम यह सोचते हुए घर आते हैं कि हमें तीन रुपये का फायदा हो गया।वह यह सोचता हुआ अपना गल्ला समेटता है कि कल से इस चीज़ का दाम चौबीस रुपये बोलना पड़ेगा। भारतीय बाज़ारों में महंगाई के सिर्फ और सिर्फ बढ़ते जाने का एक कारण शायद यह भी हो।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि बड़े बड़े अमेरिकी नगरों में अब कहीं कहीं व्यापार के इस तरीके की झलक भी दिखाई देने लगी है।भीड़ भरे पर्यटन स्थलों पर या महानगरीय इलाकों में आप ऐसा होते देख सकते हैं। पर जब ऐसा कहीं कुछ देखें तो कृपया यह मत सोचिये कि इस इलाके में अब भारतीय भी खूब रहने लगे हैं।

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