Sunday, March 27, 2011

राष्ट्रीयता अकेली नहीं होती

अक्सर कहा जाता है कि राष्ट्रीयता की भावना हर देश के हर इन्सान में होनी चाहिएदिलचस्प बात यह है कि राष्ट्र कई बार परस्पर विरोधी भी होते हैंएक दूसरे के दुश्मन भी होते हैंएक दूसरे के खून, ज़मीन और माल के दुश्मन भी होते हैंयहाँ तक कि ऐसी मिसालें भी मौजूद हैं , जब यह दुश्मनी सदियों तक चलती हैएक देश अपने खजाने को दूसरों को बर्बाद करने में खर्च करता हैनक़्शे पर अपनी सीमाओं में इजाफा करने के लिए सीमा पार के जीते-जागते इंसानों के खून से होली खेली जाती हैहजारों घरों को नेस्तनाबूद करके अपनी कूटनीतिक ख्याति बनाने की कोशिशें की जाती हैंऔर इन सब बातों को बनाये रखने के लिए जिस बल- ताकत की ज़रूरत होती है, उसे ' राष्ट्रीयता ' कह कर संजोया जाता हैदेश के युवा और ताकतवर रहवासियों से कहा जाता है कि वे शस्त्र हाथ में लेकर दूसरी ज़मीन के लोगों को जान से मार दें और यदि वे खुद इस प्रक्रिया में मर भी जाएँ तो उनके घर वालों को तसल्ली दी जाती है कि वे मरे नहीं हैं, बल्कि अपने देश के लिए कुर्बान हुए हैंयह दोहरा बर्ताव ' राष्ट्रीयता ' के अंतर्गत माना जाता है

तब क्या यह माना जाये कि राष्ट्रीयता कोई बहुत बुरी भावना हैक्या यह भावना किसी में नहीं होनी चाहिए? यह प्रश्न जितना विचित्र है, इसका उत्तर उतना ही सहज हैइसका उत्तर यह है कि राष्ट्रीयता की भावना सब में होनी चाहिए, और बल्कि किसी भी देश की युवा शक्ति और उसके बचपन में तो यह भावना कूट-कूट कर भरी होनी चाहिएक्योंकि यह भावना जन्मजात नहीं होती, बल्कि देशवासियों में पैदा की जाती हैऔर यह भावना हमेशा बुरी भी नहीं होतीहमेशा खतरनाक भी नहीं होतीबस, केवल एक छोटी सी बात यदि समझ ली जाये तो यह भावना विश्व के लिए पूरी तरह निरापद भी हो सकती हैवह छोटी सी बात यह है कि ' राष्ट्रीयता ' की भावना कभी अकेली नहीं होनी चाहिए, इसके साथ हमेशा " इन्सानियत k भावना भी होनी चाहिए


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