Thursday, March 3, 2011

स्त्री-विमर्श की ज़रुरत अमेरिका को नहीं पड़ी

अमेरिकी साहित्य बहुत ज़बरदस्त ढंग से सम्रद्ध है। साहित्य के ' नोबल ' भी उनकी झोली में न जाने कितने गए हैं। किसी काल के एक दर्ज़न सर्वश्रेष्ठ नाम किसी भी देश में बैठ कर कोई छांटे तो उनमे कई अमेरिकी साहित्यकारों का होना तय है। लेकिन इतना सब होते हुए भी वहां के साहित्य में नारी-विमर्श जैसी कोई चीज़ नहीं है। वहां शायद हमारे जितनी सीता,सावित्री,अनुसुइया,मीरा,राधा,लक्ष्मी,दुर्गा नहीं हुईं । फिर भी आम अमेरिकी महिला की ज़िन्दगी के फैसले लेने के लिए किसी विमर्श या आन्दोलन का दौर नहीं गुज़रा। इसका कारण शायद यही है कि उन्होंने जो ठीक समझा, कर लिया। ऐसा नहीं हुआ कि जो नहीं चाहिए था वह घटता रहा, और जो चाहिए था उसके लिए विभिन्न मंचों पर तरह - तरह से जुगाली के विमर्श चलते रहे। समाज दोमुंहा नहीं रहा। आज अमेरिकी शहरों या गांवों में घूमते हुए आपको सपने में भी ये ख्याल नहीं आता कि महिला कोई अलग वर्ग है, जिसके लिए पुरुषों को दरबार लगाकर फैसले लेने की ज़रूरत है। ऐसा तो हरगिज़ नहीं लगता कि इस जमात को कैसे जीना है यह अलग से तय करने की बात है।
वहां की रसोई स्त्री को देखकर ख़ुशी से नहीं झूमती। कहने की ज़रुरत नहीं कि भूख वहां भी होती है। रोटी वहां भी कमाई -खाई जाती है।वहां ऐसा कोई सम्मान या ' इज्ज़त ' नहीं है जो केवल स्त्री के लिए ही सुरक्षित हो। वहां की शानदार सड़कों पर दौड़ती शानदार कारों में से अधिकांश को महिलाएं ही चला रही होती हैं। इतना ही नहीं, बड़ी बड़ी बसें भी महिलाओं के हाथों में सुरक्षित चल रही होती हैं।
यह बचकाना हास्यास्पद सा ख्याल भी ज़ेहन में नहीं आता कि इन्हें देख कर कोई हंस रहा होगा, या किसी तरह की छींटा - कशी कर रहा होगा ।अपने देश से प्यार होना एक बात है और घटिया पन को गले लगाना दूसरी। इन्हें मिलाया नहीं जा सकता।

2 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति| आपको जब से पढ़ रहा हूँ तबसे अबतक की रचनाओं में सबसे अच्छा लगा मुझे| इस आलेख में एक बगावत नज़र आ रहा है| शब्दों में दर्द, और अभिव्यक्ति में चिंता की लकीरें साफ़ दिख रही हैं| हमारे यहां ना जाने कितने सेमीनार आयोजित हुए , कानून बनाये गए और चर्चाएँ होती रहती हैं स्त्री को उनके अधिकार दिलाने के लिए, समाज में बराबरी के दर्जे के लिए लेकिन रिजल्ट शून्य है| आगामी ८ मार्च को जब अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सौ साल पुरे हो रहे हैं यह बिल्कुल सही समय पर सही टिप्पणी है|
    झूठी तारीफ़ करना या सुनना मुझे पसंद नहीं है लेकिन सच को सच की नज़र से देखने वालों को धन्यवाद कहना ज़रुरी होता है| इसे अमेरिकी तारीफ़ और भारत को हीन भावना से देखनेवाला, के नजरिये से भी लोग देख सकते हैं लेकिन यह सच है| इसे मैं फेसबुक पर शेयर कर रहा हूँ| धन्यवाद|

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  2. aapko yah bat sahi lagi, to mujhe lagta hai ki isme kuchh sachchai to zaroor hogi. bharat ko heenbhavna se dekhne me yadi use heenata se nikalne ki ichchha chhipi ho to shayad koi nuksan nahin hai.

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