Saturday, June 25, 2011

अभीतक कुछ नहीं बिगड़ा ज्यादा कहीं

कौन कहता है कि दुनिया बुरी है 
देखो ध्यान से 
कितना कुछ तो है अच्छा अभी तक 
नहीं कर देते नदी और तालाब
अपना पानी अपने बदन पर 
अपने घर के अहाते में  ही खर्च 
कहाँ करते हैं पेड़ 
झाड़ियों पर जानलेवा हमला? 
क्या लेते हैं फूल रिश्वत कभी? 
देखी है कभी भीख मांगती हुई चिड़िया?
संसार की सैंकड़ों नस्लों में से 
केवल एक के बिगड़ जाने से 
नहीं बिगड़ जाती सारी दुनिया. 
अब भी मधुशाला नहीं झूमती 
अब भी बोतल नहीं नाचती 
साकी नहीं डगमगाता अब भी 
एक वही तो बिगड़ा जो बचा बाकी.
अभी तक कुछ नहीं बिगड़ा ज्यादा कहीं.     

2 comments:

  1. सुन्दर रचना। आपकी भावना और आशा का पूर्ण आदर करते हुए निवेदन है: अफसोस कि बिगडने वाली नस्ल सर्वाधिक शक्तिशाली है। एक अपंग भिखारी अगर भ्रष्ट हो तो शायद समाज की उतनी हानि न कर पाये जितना एक सक्षम राजनेता के भ्रष्ट होने पर होती है। एक मछली काफी है तालाब सडाने को। एक कमज़ोर कडी काफी है ज़ंजीर तोडने को। समय पर चेते तो ठीक वर्ना "का वर्षा जब कृषि सुखाने ..."

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  2. ham-aap ko bhi kahan achchha lagta hai bar-bar us nasl ko kosna, jisme ham khud aate hain. magar kuchh baton me kuchh logon ne aisa dharra bana hi liya hai ki sari aadmiyat kasauti par chadh jati hai.

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