Sunday, June 26, 2011

दक्षिणी अमेरिका ने मिठास का स्वाद लोगों को चखाया है

फल दो तरह से पकते हैं- एक तो पेड़ पर लगे-लगे ही वे पूर्ण परिपक्वता हासिल कर लेते हैं, और मीठे हो जाते हैं. दूसरे,उन्हें पेड़ से इस्तेमाल के कुछ पहले ही तोड़ लिया जाता है, और तब वे विभिन्न प्रकार कृत्रिम गर्मी देकर पकाए जाते हैं.पहली विधि में प्राकृतिक स्वाद और मिठास है, दूसरी विधि में खाने में जल्दी और पकने में देर का असमंजस है. 
सारी दुनिया जानती है कि मनु और श्रद्धा या आदम और हव्वा एक साथ, एक ही काल में इस धरती पर हुए थे.निश्चित रूप से जब उन्होंने दुनिया की शुरुआत की होगी तो किसी ने किसी के प्रति पक्षपात या विद्वेष मन में नहीं रखा होगा. वे समान संवेग की दो धाराओं की तरह दुनिया में आये थे.फिर कैसे, कब धीरे- धीरे ये होता चला गया कि दुनिया में आदम या मनु का राज है और श्रद्धा या हव्वा उसके रहमो-करम पर यहाँ जी रही है. उसे बताया जाता है कि उसे कब, क्या , कैसे करना है. और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह आयोजक नहीं, कार्यान्वयक   बने.लेकिन यह सुखद है कि इसी धरती के कुछ हिस्सों में वही बुनियादी सोच अभी भी कायम है.वहां 'आदमयुग' का पक्षपात-पूर्ण बोलबाला अभी तक नहीं है. 
दक्षिणी अमेरिका के ज़्यादातर देश इसी सोच के पोषक हैं. अगले कुछ आलेखों में हम ऐसे ही देशों की इसी गरिमा-पूर्ण वृत्ति पर बात करेंगे.        

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