Saturday, June 25, 2011

२०० वाँ पड़ाव- "लोग पत्थर फेंकते हैं "

एक नन्हे से पिल्ले ने,जिसने अभी कुछ महीने पहले ही दुनिया देखी थी,अपनी माँ से जाकर कहा-"लोग पत्थर फेंकते हैं". 
कुतिया क्रोध से तमतमा गई. बोली- उन्हें मेरे सामने आने दे, तेज़ दांतों से काट कर पैर चीर कर रख दूँगी. तू वहां मत जा, यहीं खेल. वे होते ही शरारती हैं. 
पिल्ला अचम्भे से बोला- ओह माँ, तुम कैसे सोचती हो? मैं तो गली के नुक्कड़ पर घूमने गया था. वहां मजदूर लड़के ट्रक से पत्थर खाली कर रहे हैं. वे पत्थर उठा-उठा कर नीचे सड़क पर फेंकते हैं. मैं तो खड़ा-खड़ा उनका पसीना देख रहा था. अब हमारी सड़क भी पक्की बन जाएगी. 
कुतिया ने इधर-उधर देखा और झुक कर पैर से कान खुजाने लगी. 
["पाज़िटिव थिंकिंग" या सकारात्मक चिंतन का संकेत करती यह 'लघुकथा' आपसे मेरी बातचीत की २००वी कड़ी है. मैं लगातार साथ चलने के लिए आपको बधाई देता हूँ और आगे के रास्ते के लिए खुद को हौसला भी देता हूँ.]       

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