Wednesday, June 8, 2011

किसकी खाल मोटी,अफ़्रीकी गैंडे की या भारतीय?

तसवीरें दो तरह की होती हैं. एक शौकिया छायाकारों द्वारा उतारी गई और दूसरी पर्यटन विभाग द्वारा मार्केटिंग अभियान के अंतर्गत प्रस्तुत की गई. शौकिया छायाकार यकीनन फनकार होते हैं. वे मेहनत करते हैं.अपने हुनर को समय देते हैं. और वन्य जीवों की एक से एक नायाब तसवीरें निकाल कर लाते हैं.पर्यटन विभाग के छायाकार सरकारी होते हैं. अग्रिम राशि लेकर दफ्तर से निकलते हैं और मोटी रकम बाद में मिलनी तय होती है, फिर जानवर तसवीर में कैसा आता है, यह खुद उसकी[जानवर की] निजी स्मार्टनेस पर निर्भर है. 
आपको याद होगा कि चंद सालों पहले हर विदेशी वस्तु अच्छी हुआ करती थी, वन्य प्राणी भी.उस समय हम यदि भारतीय गैंडे को भी देखते थे तो वह हमें अफ़्रीकी गैंडे की तुलना में फीका, डल, दुबला और नर्वस दिखाई देता था. किन्तु अब हम सब जान चुके हैं कि वह कैमरों की क्वालिटी का कमाल होता था.अब भारत में भी उस गुणवत्ता के कैमरे होने लगे हैं, तो वन्य-प्राणी भी चपल, चंचल और तंदुरुस्त दिखने लगे हैं. अब ऐसे सवाल अहमियत नहीं रखते कि अफ़्रीकी जंगलों में विचरने वाले हाथियों की नस्ल बेहतर है या भारतीय वनों में? यहाँ तक कि डिस्कवरी चैनल  पर भी कई अजीबो-गरीब द्रश्य देखते वक्त आपको यह महसूस होता रहता है कि यह छायांकन भारत के किसी हिस्से का भी हो सकता है. 
लेकिन एक बात में हमने अपनी मौलिकता अभी तक नहीं खोई है. "यहाँ शिकार करना मना है" या "यहाँ मछली पकड़ना अपराध है" या फिर "वन्य प्राणियों को नुक्सान पहुँचाने पर जुर्माना किया जायेगा" जैसे जुमले अब भी केवल हमारी ही धरोहर हैं.चार-टके के मुनाफे के लिए लाखों के शेर मार लाना कोई हमसे सीखे.इस मामले में हमारी खाल का कोई सानी नहीं. असल में पशुओं के प्रति क्रूरता का भाव हमें किसी भी तरह उद्वेलित करता ही नहीं. शायद इसका कारण यह हो कि हम पूजा करते वक्त अपने ईश्वरों को भी "मृगछाला" लपेटे देखते ही रहे हैं. हमारे गजपति-गणपति चूहे पर बैठ कर विचरते हैं. कृष्ण के मोर-मुकुट की शोभा को जीवंत करने के लिए हम राष्ट्रीय पक्षी मोर को जहरीला दाना डाल देते हैं. बालों में पंख सजाने के लिए कितने ही लोटन कबूतर मारने में हमें कोई गुरेज़ नहीं. वाहन तो अक्सर सभी देवी-देवताओं के जंगल से ही आते हैं. आखिर वन्य-प्राणियों की सुरक्षा हम करें भी तो कैसे? क्या इनके लिए अपने देवताओं को पैदल कर दें?          

2 comments:

  1. अहिंसा परमो धर्मः!
    आपके आलेख की मूलभावना से सहमत होते हुए भी निष्कर्ष से घोर असहमति दर्ज़ कराना चाहूंगा। चाहे मृगछल की बात हो या मोरपंख की, भारतीय संस्कृति में यह सभी हिंसा-विहीन तरीके से ही आते थे और आज भी पशुहिंसा में लिप्त शायद ही कोई व्यक्ति इन देवताओं से प्रेरणा लेता होगा। इसके विपरीत इन देवताओं के उपासक जानबूझकर ऐसी किसी हिंसा को बढावा देने से रहे। गोपालकों के देश में मृदंग की खाल सदा मुर्दार गोचर्म से ही बनती थी और कृष्ण जी भी मोरपंख के लिये मोर नहीं मारते थे। पीताम्बर, श्वेताम्बर आदि की संस्कृति में चर्मपत्र पहने दिखाये जाने वाले देवता भी दर-असल दिगम्बर हैं। वैसे भी पशुपतिनाथ से बडा पशुहितकारी कौन होगा?

    चिंतनीय मुद्दा उठाने का धन्यवाद, जहाँ भी यह हिंसा हो रही है उसे रोका जाना ज़रूरी है।

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  2. aapki baat poori tarah pavitra soch ke dayre me hai, main bhi yahi maanta hoon, par jise aap mera nishkarsh kah rahe hain wah nishkarsh nahin balki vyangy kar uthaya gaya dhyan-aakarshan hai. aapko bahut-bahut dhanywad, ki aapne abhidha-lakshna-vyanjana ki trai me lapet kar kahi gai baat ko paathkon ke liye suljha kar parosa hai.

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