Sunday, March 31, 2013

जल तू जलाल तू

पानी की फितरत भी बड़ी अजीब है। सफीने इसी में तैरते हैं, इसी में डूबते हैं।
जिंदगी से पानी उतर जाए तो केवल आग बचती है। फिर इस बुखार में तपकर रावण सीता को चुराता है। इसी से सुलग कर राजकन्या मीरा पत्थर की मूर्ति पर सिर रगड़ती है। इसी तूफ़ान से अभिमन्यु कोख में चक्रव्यूह चीरना सीखता है, इसी के ताप से भस्मासुर शिव के पीछे भागता है।
[दिशा प्रकाशन, दिल्ली से शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास "जल तू जलाल तू" के सरोकार]

2 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार2/4/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है

    ReplyDelete

Some deserving ones for...No. 1

देश जल्दी ही एक नए राष्ट्रपति का नेतृत्व पाने को है। कहना पड़ता है कि राजनैतिक दलों का आपसी वैमनस्य और कटुता असहनीय होने की हद तक गिर चुके ह...

Lokpriy ...