Sunday, March 17, 2013

उन्हें इस देश की फितरत का अंदाज़ हो जाना चाहिए था

वे स्विट्ज़रलैंड से आये थे। शायद उन्हें ये अहसास नहीं था कि वे उस देश में जा रहे हैं, जहाँ के बड़े-बड़े रसूखदार लोग अपना पैसा रखने के लिए उनके देश स्विट्ज़रलैंड में आते हैं। उन निर्दोष भोले-भाले युवाओं ने सोचा था कि  जब भारत का पैसा उनका देश सुरक्षित रख लेता है तो शायद उनके देश के लोगों की जान भारत भी सुरक्षित रखेगा। वे किसी जोखिम भरी सरहद पर नहीं थे, देश के बीचोंबीच अर्थात मध्यप्रदेश से गुजर रहे थे। उन्होंने अपनी यात्रा के लिए कोई संदिग्ध युद्धपोत, लड़ाका विमान या जासूसी का हेलिकोप्टर नहीं चुना था, वे बच्चों की तरह सायकिल से गुजर रहे थे। उन्होंने अँधेरी रात में कोई खुफिया बंकर नहीं बांधा  था वे एक परी-कथाओं से शामियाने में बसर कर रहे थे।
उन्हें क्या मालूम था कि यह ऐसे वीर जवानों का देश है जो आधी रात भेड़ियों की तरह निर्दोष विदेशी अतिथियों पर टूट पड़ेंगे और उनकी जान ही नहीं, बल्कि इज्ज़त से खिलवाड़ करेंगे। वे कहाँ जानते थे कि  अपने आप को तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था कहने वाले देश में उनका ज़रूरी साज-सामान इस तरह लुट जाएगा। उन्हें नहीं पता था कि  "नारी तू नारायणी" गाने वाले मुल्क में पशुओं से भी बदतर इंसानों से उनका वास्ता पड़ेगा।
खैर, हमारे पास धैर्य की कोई कमी नहीं है। विदेशी जोड़ा अपने देश लौट जाएगा। हमारे दरिन्दे या तो पकड़े ही नहीं जायेंगे, यदि पकड़ भी लिए गए तो जेल में उनके रोटी-कपड़ा और सेहत के लिए आवाज़ उठाने वाले कहीं न कहीं से नमूदार हो ही जायेंगे। और फिर कोई मंत्री ऐलान कर देगा कि धीरे-धीरे पब्लिक सब भूल जाती है।         

6 comments:

  1. ऐसे अपराधों का भारत मे आम होते जाना बहुत दुखद है। देश को एक प्रशासन की, सरकार की, व्यवस्था की ज़रूरत है। किन लोगों को चुनते हैं हम हर चुनाव में? किसलिए? और इतना बड़ा तामझाम आईएएस-आईपीएस और दूसरे नौकरशाहों का? कहाँ रहते हैं ये लोग?

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  2. sarkaar,vyavastha, naukarshahi, sab hai ...ye rahte bhi rajdhaaniyon ke sabse sambhrant ilaakon me hain. bas, deshvasiyon ka zameer kho gayaa hai.

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  3. देश में यौन अपराध की घटनाएँ दिन प्रति दिन बढती ही जा रहीं हैं,सरकार ने अपनी जन में कड़े कानून बनाने का निर्णय लिया,जबकि पहले से ही देश में कानून तो हैं ही,समस्या तो उन्हें कठोरता से लागू करने की जरूरत है,और इस कार्य के लिए कोई भी सरकार चाहे केंद्र अथवा राज्य की हों,में इच्छाशक्ति नहीं हैं,सुरक्षा कर्मचारी तो वी आइ पी लोगों के लिए हैं.आम जनता तो कहीं भी चले जाएँ भगवान भरोसे ही है.दूसरे जब तक जनता में इस प्रकार के अपराधों व अपराधियों के प्रति दंड देने की भावना जागृत नहीं होगी,तब तक केवल कानून से इनको रोकना संभव नहीं लगता.लोगों का नैतिक चरित्र जब तक इसमें पूर्ण सुधार मुमकिन नहीं लगता.
    ऐसा लगता है कि जिस प्रकार दिल्ली यौन अपराधों की राजधानी बन बदनाम हो , गया है उसी प्रकार देश की विदेशों में छवि यौन अपराधों के सिरमौर राष्ट्र की न बन जाये.जहाँ विदेशी आने में संकोच करें.यह एक चिंतनीय विषय है,

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  4. aapki baat sach hai, thodi der ke liye chhavi ki baat bhool bhi jayen, to ab to chinta yah hai ki sadkon par janwaron aur insaanon ke beech antar banaa rah sake. mujhe lagta hai ki ladkiyon ke ghar se nikal kar kamaane se purushon ke rozgaar par padaa antar hi is sab ki asli vajah hai.

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  5. Waqt ki dhundh me sabkuch fika pad jata hai :(

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  6. boodhon ko to feeka bhi chal jata hai, par ham chaahte hain ki yuva to meetha hi khaayen. Dhanyawad.

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