Saturday, March 2, 2013

फेफड़े में पानी

कुछ दिन पहले मेरे एक परिचित अपनी दुकान पर बल्ब लगाते हुए स्टूल फिसल जाने से गिर गये। दुकान पर उस समय उनका एक किशोर नौकर ही था। उसने ही उन पैंसठ साल के मालिक को सम्हाला और लेटा दिया। जब उसने देखा कि  मालिक को थोड़ी बेचैनी हो रही है तो उसने अपना कर्त्तव्य समझ कर दूकान को बंद किया और एक रिक्शा से उन्हें पास के एक नर्सिंग होम में ले गया। थोड़ी ही देर में जांच कर डॉक्टर ने बताया कि  उनके फेफड़े में पानी भर गया है, जिसे निकालना होगा। नौकर ने मालिक से सलाह की, पर मालिक आश्वस्त नहीं दिखे और बोले कि  वह उन्हें वापस घर ले चले। डॉक्टर की परामर्श फीस देकर वे दोनों लौटने लगे। उन्हें रास्ते में एक और डॉक्टर का बोर्ड दिखाई दे गया।
उन्होंने सोचा, बात की पुष्टि कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। अतः उन्होंने दूसरे डॉक्टर से परामर्श किया। वहां उन्हें बताया गया कि  फेफड़े में खुश्की, अर्थात कफ जम जाने से जकड़न हो गयी है, जिसे साफ़ करना होगा। वे वहां से भी केवल परामर्श शुल्क देकर निकल लिये।
वापस लौट कर वह सामान्य होकर जब काम में लग गए, नौकर को राहत मिली। उसने पूछ लिया- "मालिक, फेफड़े होते कहाँ हैं?"
उन्होंने सीने पर हाथ लगा कर बता दिया- "यहाँ"
नौकर आश्चर्य से बोला-"मगर आप गिरे तो पीठ के बल थे"
वे बोले-"गिरते हुए तो तूने देखा था, डॉक्टर साहब ने कहाँ देखा?" यह कह कर वे जोर से हँसने लगे।
नौकर की समझ में नहीं आया, कि  मालिक चोट खाकर भी हँस क्यों रहे हैं। वह कभी स्टूल को देखता, कभी मालिक की पीठ को।     

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