Tuesday, March 19, 2013

मुद्दों पर नट

जब कोई भी दो व्यक्ति बात करते हैं, तो कभी एक दूसरे  से सहमत होते हैं, कभी असहमत। जब पांच सौ बयालीस व्यक्ति बात करते हैं, तो ...
लेकिन अनर्थ आसानी से नहीं होता। असहमति के जितने सुर होते हैं, रिज़र्व बैंक के पास उतने ही ताल। मतलब यह, कि  गांधी की फोटो का कागज़ सबकी सब विपदाएं हरने में सक्षम है।
रोते बच्चे को लॉलीपाप , रोते युवा को नौकरी, रोते बूढों को पेंशन, सबका कोई न कोई इलाज तो होता ही है। मुद्दे तीन हों, या तेरह, चार चाबुकों से सब सध  जाते हैं- साम, दाम, दंड, भेद। बस बढ़िया नट  चाहिए।
फिर मुसीबतों के घाट पर तारणहारों की कमी थोड़े ही है। एक जाने को तैयार तो दो आने को।

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Some deserving ones for...No. 1

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