Saturday, September 15, 2012

अरे , ऐसा भी कहीं होता है?

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव नवम्बर में हैं, जोर आजमाइश चल रही है। लेकिन ओबामा महोदय का एक बयान अख़बारों में छपा है कि "मैं चुनाव हार भी सकता हूँ", यह बात जितनी स्वाभाविकता, संजीदगी, और मासूमियत से कही गई है, उतनी ही सही भी है।
कहीं भी, कभी भी, कोई भी चुनाव हार ही सकता है। चुनाव क्या, हर खेल में हार-जीत तो भविष्य के गर्भ में ही होती है। यदि कहीं यह अहंकार हो, कि मुझे कोई नहीं हरा सकता, तो फिर चुनाव की ज़रुरत ही न रहे।
लेकिन हम यह सब क्यों सोचें, हम तो भारत में हैं।
हमारे यहाँ तो ऐसा कभी कोई सपने में भी नहीं कहता। नाकारा, बण्डलबाज़, खूनी ,चापलूस,चमचा , लुटेरा, चोर, घोटालेबाज, निकम्मा, ...[और जो भी पर्यायवाची हो सकते हों,] चाहे जैसा भी उम्मीदवार हो, वह यह कभी नहीं कहता कि  मैं हार भी सकता हूँ। यहाँ तो वोटों की गिनती के दौरान भी यदि यह पता चले कि  आप अपने विरोधी से पांच लाख वोटों से पीछे चल रहे हैं, तब भी यही कहा जाता है कि  अभी नतीजा पूरा नहीं आया है। इतना ही नहीं, यहाँ तो यदि आप हार ही जाएँ, तब भी यही कहने का रिवाज़ है कि  गिनती में घपला हुआ है, जनता तो मुझे ही चाहती है। ऐसे आत्म-विश्वास पर ही तो लोकतंत्र चलता है!   

9 comments:

  1. वाह ! बढ़िया कहा है..

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  2. अपने मुंह मिया मिट्ठू बनाए में क्या हर्ज़ है किन्तु सत्य को झुठलाकर कहाँ जिया जा सकता है . एक दो उदाहरण सत्य कहा जा सकता है? दिल भुलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है .

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  3. बहुत कम लोग होते हैं जो सच्चाई का सामना करने से घबराते नहीं और मेरे ख्याल से ओबामा उनमे से एक होंगे |

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  4. Aapne bilkul theek kaha hai,dhanywad!Lekin hamare loktantra men bahaduri ki nahin, moolyon ki kami hoti ja rahi hai.

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  5. शायद उनकी ये सरलता सहजता उन्हें दुबारा राष्ट्रपति बना दे.....

    सादर
    अनु

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  6. यही चीज तो हमॆं उनसे अलग करती है ।

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  7. Dhanywad, kintu kewal alag nahin, balki thoda tarksammat dhang se alag dikhne ki baat ham sochen to zyaada behtar nahin ho?

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