Thursday, September 13, 2012

कभी आकाश में पानी, कभी पाताल में पानी।

मैं सचमुच चिंतित हो गया था, मुझे लगा कि अब डूबा पानी, कोई बाढ़ नहीं आई, लेकिन शहर पानी का अभ्यस्त नहीं था,इसी से प्रकृति का थोडा सा मज़ाक भी आपदा जैसा लगा। सबसे पहले तो हमारे-आपके बीच वही तकनीकी व्यवधान आया, कि संवाद टूट गया।
अब बादल छट गए हैं। धूप देखेंगे।   

2 comments:


  1. सार्थक और सामयिक पोस्ट, आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉगmeri kavitayen की नवीनतम पोस्ट पर भी पधारने का कष्ट करें.

    ReplyDelete
  2. संवादहीनता सबसे बड़ी खतरनाक स्थिति है . जो मृत्यु से भी भयावह .

    ReplyDelete

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...