Saturday, September 15, 2012

चित भी मेरी, पट भी मेरी, बनाम चुप रहने पे तूफ़ान उठा लेती है दुनिया

   एक राजा  था। वह अपनी प्रजा के लिए कुछ नहीं करता था। प्रजा तरह-तरह से उसे उकसाती कि  वह कभी तो जन-समस्याओं पर ध्यान दे। राज में चल रही अराजकता पर कुछ तो बोले। लेकिन राजा होठों को फ़ालतू चीज़ समझता था। जब लोग बोल-बोल कर थक गए तो वे तरह-तरह से अपना विरोध जताने लगे। कोई राजा पर फब्तियां कसने वाली कविता लिखता, तो कोई उसका कार्टून बना डालता। कोई काले झंडे दिखाता तो कोई पुतला ही फूंक डालता। राजा इस सब को प्रजा की "कलात्मकता"मान कर निर्लिप्त रहता, और शब्द-बैंक में एक धेले का भी चैक न डालता।
   अगर कोई रात-दिन पत्थर की मूर्ति के सामने बैठ कर आरतियाँ गाता रहे, तो आखिर एक दिन मंदिर की दीवारों से भी प्रतिध्वनियाँ फूटने लगती हैं। राजा ने भी आखिर एक दिन अपने होठों को चकमक पत्थर की तरह रगड़ने की ठानी। राजा के पत्थर के होठ बजे तो उनमें से कुछ बुदबुदाने की आवाज़ आने लगी। प्रजा तुरंत राजा के उदगार सुनने को दौड़ी। सब कान लगा कर राजा की बात सुनने लगे।
   राजा कह रहा था- मेरे विरोधी जो कहें, उसका उल्टा करदो। लोग महंगाई कम करने को कहते हैं तो और बढ़ा दो। मुझे राज छोड़ने को कहते हैं तो मेरी कुर्सी से मुझे और कस कर बाँध दो।   

4 comments:

  1. कहानी का दूसरा मूल भाग भी है एकांगी कथा कहना अच्छी बात नहीं . कहना पड़ता है दूसरा भाग .

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  2. Aapki baat bilkul sahi hai, har kahani ke kam se kam do pahloo to hote hi hain. lekin donon ek sath kah diye jayen to fir kahani koi nahin padhta. Aksar aisa hota hai ki interval tak ek paatra doosre ko maarta hai, fir interval ke baad doosra pahle ko. Baad me ITIHAAS tay kar deta hai ki nayak kaun aur khalnayak kaun?Aapke sateek chintan ke liye Aabhar!

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