Monday, May 30, 2011

आन-बान-शान से तेरे कूचे से हम निकले

आपने अवश्य पढ़ा होगा कि कई बड़े साहित्यकार और लेखक विभिन्न सरकारी नौकरियों को छोड़ कर साहित्य के क्षेत्र में आये. ऐसे भी अनेक किस्से आपके सुनने में आये होंगे कि कई लेखक किसी न किसी कारणवश अपनी नौकरियां पूरे समय [सेवा निवृत्ति] तक नहीं कर पाए. यह भी लगभग सर्वमान्य सत्य है कि कम से कम भारत में केवल साहित्य या लेखन के सहारे कोई आजीविका नहीं चला सकता.फिर भी नौकरियों को छोड़ना क्या लेखकों की अपनी मर्ज़ी से होता है? या वे सहजता से कार्य नहीं कर पाते ?वे अपने अधिकारियों  व मालिकों को प्रायः संतुष्ट नहीं रख पाते. अनेक लेखकों की आत्म-कथाएं पढने और उनके स्पष्टीकरणों को जानने के बाद कहा जा सकता है कि लेखकों द्वारा नौकरी न कर पाने के पीछे प्रायः प्रमुख कारण यह होते हैं- 
नौकरी का अर्थ है, कि कोई आपके समय और मानसिक दौलत का मूल्य चुका रहा है, जिसके बदले ये चीज़ें आपसे चाहता है. लेखक प्रायः इन दोनों ही चीज़ों को अपनी निजी मिल्कियत समझते हैं, इसलिए लम्बे समय तक इनका मोल नहीं दे पाते. इस से नौकरी का करार टूट जाता है या तोडना पड़ता है. 
समाज सबका मूल्यांकन पैसे, प्रतिष्ठा या पद से करता है. लेखक अपना मूल्यांकन-पैमाना इन बातों को नहीं मान पाते इसलिए जल्दी ही समाज के पैमाने पर बेमेल सिद्ध हो जाते हैं. 
रचना-शीलता एक सृजन या नया उत्पन्न करने की प्रक्रिया है. ऐसे में लेखक भी अपने लिए इच्छित सुविधाएं इसी तरह मौलिक अधिकार मानते हैं, जिस तरह महिलायें प्रसूति अवकाश को अपनी आवश्यकता मानती हैं, या श्रमिक शारीरिक मेहनत के बाद विश्राम चाहता है. किन्तु उनके मामले में यह सुविधा उन्हें अधिकार के रूप में नहीं दी जा पाती जो असंतोष का कारण बनती है. 
लेखक की सामाजिक प्रतिष्ठा उसे मिलने वाले सालाना इन्क्रीमेंट या प्रमोशन के लिए नहीं रूकती, वह उसके लेखन-कर्म के परिणाम- स्वरुप निर्धारित होती है. ऐसे में लेखक कार्यालय के पद-सोपान में व्यतिक्रम या अवरोध उत्पन्न कर लेता है जो उसके नियोक्ताओं को स्वीकार्य नहीं होता. ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब लेखक की किताब छपकर आने पर उसे चारों ओर से बधाई प्राप्त हुई पर उसके दफ्तर ने यह 'कारण बताओ' नोटिस जारी किया कि पुस्तक प्रकाशित करने से पहले प्रबंधन से अनुमति क्यों नहीं ली गई? दूसरे शब्दों में कहें तो लेखक को चारों ओर से मिले मान-सम्मान के बीच अपने कार्यालय में 'घर की मुर्गी दाल बराबर' माना गया. 
किसी भी कार्यालय में गोपनीयता, कार्य-संस्कृति और कार्यालय हित को सर्वोपरि माना जाता है, जबकि लेखक अभिव्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता चाहता है. 
लेखक की प्रतिबद्धता उस व्यक्ति, विचार या स्थिति के प्रति होती है जिसे वह अपने मूल्यांकन में सही मानता है. इस से कार्यालय में उसकी राय अलग-थलग पड़ जाती है और उसका स्वाभिमान उसे वहां से निकाल लाता है.      

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