Monday, May 2, 2011

आतंक का एक परबत अमेरिकी फूंक से गायब

पिछले कुछ समय से सभी दिशाओं में आतंक का जैसा जयकारा गूँज रहा था उस से यह शंका ज़रूर उपजती थी कि कहीं कोई विध्वंसक दिमाग दबा पड़ा है जो राख की चिंगारियों में जब-तब फूंक मारता रहता है.शक की सुई कई मुल्कों के इर्द-गिर्द डोलती रहती थी किन्तु केवल संदेह के आधार पर कुछ ठोस कहा नहीं जा पाता था.हर भू-डोल या तबाही का कोई न कोई कारण होता ज़रूर है, चाहे प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे. यहाँ अमेरिका ने एक बार फिर अपनी भूमिका का निर्वाह किया. जिस सफाई से सब कुछ ख़त्म करके विश्व को सूचना दी गई यह अमेरिका का ही बूता था.कुछ ऐसे मुल्क और लोग जो अमेरिका की हर कारगुजारी को ठंडेपन और अवहेलना से देखने के आदी हैं, शायद फिर अपने मुंह की मक्खियाँ उड़ाने में कुछ समय लेंगे, उसके बाद ही कुछ कह पाएंगे, लेकिन वे जब भी जुबान की जुम्बिश का मन बनायेंगे, कम से कम ये तो स्वीकार करेंगे ही कि अमेरिका व्यावसायिक उथल-पुथल में भी अपने और दुनिया के अमन-चैन से खेलने वालों को दंड देने की अपनी ज़िम्मेदारी नहीं भूला. और भारत के सन्दर्भ में बात करें तो यह सोचने में भी कोई संकोच नहीं है कि लोग इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आगामी चुनाव से जोड़ कर देखेंगे और इसे सही वक्त पर करिश्मा करने की संज्ञा ही देंगे. इसमें भारतीय जन-मानस को कोई दोष भी नहीं दिया जा सकता क्योंकि भारतीय नेताओं ने उसे यही सिखाया है. हम वोटों के मौसम में ही खिलने के आदी हैं. बहरहाल भविष्य के हर ओसामा को नियति पर सोचने का एक मौका तो मिलेगा.      

2 comments:

  1. सोलह आने सही बात..Please remove word verification..

    ReplyDelete
  2. aapko baat sau paise sahi lagi, to tay ho gaya ki yah sahi hi hogi.

    ReplyDelete

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...