Saturday, May 7, 2011

लोहे की गेंद लेकर दौड़ते निशानेबाज़

बचपन में अपने मोहल्ले में हम लोग एक खेल खेला करते थे जिसमे कपडे की गेंद से एक-दूसरे पर प्रहार किया जाता था. कभी-कभी यह गेंद बहुत जोर से पेट या पीठ पर वार करती थी क्योंकि अधिकांश लड़कों के निशाने अचूक हुआ करते थे.खेल के बीच में ही दहशत का माहौल बन जाता था. आज जब मैं किसी शहर को देखता हूँ तो मुझे लगता है कि लड़के बड़े हो गए हैं और सभी के हाथ में कपडे की नहीं, लोहे की गेंद है, जो किसी रिवाल्वर से बिजली की गति से छोड़ी जा रही है. और अब खेल में गेंद एक नहीं बल्कि हर खिलाडी के हाथ में अलग-अलग है. कमोवेश सभी शहरों की यही स्थिति है. मैं बात कर रहा हूँ, आज सड़कों पर दौड़ते वाहनों की. हर वाहन अचूक निशानची लड़के की गेंद की तरह आता है. ज़रा सा निगाह चूके नहीं कि गए. सड़कों ने चौड़ा होते-होते फुटपाथों को तो खा ही लिया है. पैदल चलते आदमी के लिए शहरी यातायात में कहीं कोई जगह नहीं है. 
हो सकता है कि गति और मौज-मस्ती पसंद करने वाले युवावर्ग को इस स्थिति से कोई गिला-शिकवा न हो, पर यह तय है कि हमारी मौजूदा सभ्यता जब भी ध्वस्त होगी, तो इन्ही वाहनों के बेढंगे प्रयोग के कारण.हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की भांति टीले बन चुके शहरों की खुदाई में से कभी इन्ही के पुर्जे निकलेंगे, और इनके बीच-बीच में से खोज कर तलाशनी पड़ेंगी मानव-अस्थियाँ. संसार का यह बेहतरीन आविष्कार इसे प्रयोग करने की शैली और प्रयोजन में लापरवाही के चलते जानलेवा बनता जा रहा है. युवा वर्ग की लापरवाही का तो यह हाल है की आप कहीं भी , किसी समय चलिए, पीछे से होर्न आपको ऐसे सुनाई देते रहेंगे कि चलो, इस बार तो जान बख्श दी  , आगे ध्यान रखना. यदि आठ बजे घर से निकलना है तो वे साढ़े आठ बजे निकलेंगे और दो घंटे के रास्ते को डेढ़ घंटे में तय करने की कोशिश करेंगे. अपनी भी जान जोखिम में डालकर, और दूसरों की भी.  शराब पीकर या मोबाइल पर बात करते हुए चलने वालों को देख कर तो ऐसा लगता है, काश, इनके सर में थोडा सा भी दिमाग होता तो ये सोच पाते कि ये क्या कर रहे हैं.मेरा अनुभव यह है कि एक बार किसी एक्सीडेंट के बाद ही कोई ड्राइवर निपुण बन पाता है. यह कहना क्रूरता होगी, पर कहना पड़ता है.       

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