Saturday, May 21, 2011

चीनी कम बनाम "स्वामी सच्चिदानंद के सदाचार की समर्पण-भावना का कलात्मक चित्रण"

हमारे व्यवहार से रिश्तों में मिठास बढती है. लेकिन मिठास घटने लगे तो हमेशा यह मत सोचिये, कि व्यवहार ठीक नहीं. मेरे एक मित्र ने एक दिन मुझे अपने घर रात्रि-भोज का निमंत्रण दिया. इसमें नई बात कोई नहीं थी, क्योंकि वैसे भी मैंने उनके यहाँ कई बार चाय-काफी पीने की रस्म अदा की थी.मैं समय पर पहुँच गया. लेकिन वहां जा कर मुझे कुछ अनोखा ज़रूर नज़र आया. मित्र के घर का माहौल बहुत ही औपचारिक सा लगा. दोनों पति-पत्नी ताज़ा बदले कपड़ों में सजे खड़े थे. ड्राइंगरूम को भी थोड़ी अतिरिक्त साज-सज्जा दी गयी थी.और सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो यह, कि खाने की मेज़ पर एक बेहद नफीस फूलों के गुलदस्ते के साथ एक सुन्दर सी मोमबत्ती सजी थी. नेपकिन आकर्षक तरीके से लगाये गए थे. 
मैं चौंका, आज कोई पार्टी-वार्टी  है क्या? कौन आ रहा है? किसी का जन्म-दिन, एनिवर्सरी आदि है ? मैं तो यूँही खाली हाथ चला आया.मेरे मन के संकोच को भांप कर मित्र ने मुझे सामान्य बनाने की कोशिश की. कहा- नहीं-नहीं, न तो कोई पार्टी है और न ही कोई और आने वाला है. अब फिर चौंकने की बारी थी.अर्थात केवल मेरे खाने के लिए ही यह सारा उपक्रम किया गया था? 
खैर, जब खाना शुरू हुआ तो उनकी श्रीमती जी ने कुछ सकुचाते हुए कहा- ये आज आपको कुछ दिखाने वाले हैं.  मैंने कहा- अरे, ऐसा क्या है? दिखाइये-दिखाइये फ़ौरन. मैं उनके बनाए और परोसे गए पकवानों से खासा उत्साहित था. मैं आइस-क्रीम ख़त्म ही कर रहा था कि मित्र महोदय भीतर जाकर कागजों का एक पुलिंदा उठा लाये. 
क्या कोई प्लाट व्लाट ख़रीदा है? मैंने उत्सुकता से कहा. वे बोले- प्लाट खरीदा नहीं, प्लाट लिखा है. उन्होंने शर्म से लजाते हुए पत्नी की ओर देखा, पत्नी भी मुस्करा दीं. 
तो यह बात थी. मित्र महोदय ने एक कहानी लिखी थी, और वे उसे मुझे दिखा कर यह चाहते थे कि मैं उसे कहीं से छपवा दूं. वे जानते थे कि मेरी किताबों के चलते कुछ प्रकाशक मेरे मित्र हैं. उनकी कहानी का शीर्षक था- "स्वामी सच्चिदानंद के सदाचार की समर्पण-भावना का कलात्मक चित्रण" . मुझे लगा शायद उन्हें रद्दी में कहीं किसी का शोध-प्रबंध मिल गया होगा,जिसे वे तोड़-मरोड़ कर कथानक का रूप दे बैठे. खैर, मैंने उन्हें अपने एक प्रकाशक मित्र के पास भेज दिया. 
प्रकाशक महोदय ने उन्हें चार-पांच चक्कर कटवा कर एक दिन समय दिया और संक्षेप में उन्हें ये सुझाव दिए- देखो, इसमें से 'स्वामी सच्चिदानन्द' हटा दो.इस से ये किसी स्वामी की जीवनी लगती है. मित्र फ़ौरन मान गए. इस से उत्साहित होते हुए प्रकाशक महोदय ने कहा- आजकल नई पीढ़ी सदाचार की बात कहाँ सुनती है, इसे हटा देना ही ठीक है. फिर वे बोले- भाई, आजकल लोग भावुक होते ही कहाँ हैं जो तुम समर्पण-भावना लिखोगे. लिहाज़ा ये भी हट गया. अब बचा- कलात्मक चित्रण. प्रकाशक जी इतने पर भी नहीं माने, बोले-कला से लोग चिढ़ते हैं. कला फ़िल्में तक नहीं चलतीं. अतः किताब का शीर्षक 'चित्रण' करके प्रकाशक जी ने बैठक मुल्तवी कर दी और उन्हें अगले सप्ताह फिर आने को कहा. 
अगली बैठक में प्रकाशक फ्रेश दिमाग से थे, अतः बोले- खाली 'चित्रण' से लोग भ्रमित हो जायेंगे कि आखिर ये काहे का चित्रण है. इसमें कुछ जोड़ो.मित्र महोदय उत्सुकता से उनका मुंह ताकने लगे. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि जब प्रकाशक जी ने उनका पूरा शीर्षक खारिज किया है तो नया भी वही सुझायेंगे.प्रकाशक जी बोले- चित्रण तो किसी चीज़ का होता है. लोग लड़ाई, झगडे, युद्ध,ग़दर के चित्रण देखना पसंद करते हैं. पौराणिक फिल्मों में तलवार- भाला- बरछी- गदा का चित्रण होता था. पब्लिक गद-गद हो जाती थी. 
लेखक महाशय को गद-गद, गदा, ग़दर सुनते-सुनते शीर्षक याद आ गया. बोले- "गदराया चित्रण" रख दें? प्रकाशक थोड़े आश्वस्त हुए पर पूरे नहीं. बोले- गदराया तो ठीक है, पर इस के साथ चित्रण शब्द जम नहीं रहा. फिर, गदराया जीवन रख दें, लेखक ने कहा. प्रकाशक झुंझलाए, बोले- क्या बात करते हैं, पूरा जीवन भला गदराया कहाँ होता है? बुढापा कहीं गदराता है, बचपन गदराता देखा है कभी? तब? फिर? 
आखिर लेखक जी के ज्ञान-चक्षु खुले-वे तपाक से बोले - 'गदराया यौवन'? हाँ, अब बनी बात. प्रकाशक ने कहा. 
लेखक को लगा, चलो, शीर्षक फायनल हुआ अब तो किताब छप जाएगी.पर यह क्या, प्रकाशक महाशय उनका पुलिंदा उन्ही को लौटाते हुए बोले- ये लीजिये, जब हो जाये तो ले आइये.
क्या हो जाये? लेखक ने भोलेपन से कहा. 
भाई, जब कहानी शीर्षक के अनुसार हो जाये तो ले आइयेगा, देख लेंगे. कह कर प्रकाशक जी भीतर धंस गए, और लेखक महोदय भारी क़दमों से घर लौटे. 
बाद में मैंने एकदिन सुना, कि उनकी पत्नी उन पर बहुत बिगड़ीं.बोलीं- ख़बरदार, जो ऐसे नाम की किताब घर में लेकर भी आये तो. 
कई दिन बाद, एकदिन वे फिर पकड़ कर चाय पिलाने घर ले गए. लगभग आधे घंटे इंतजार कराके उनकी श्रीमती जी ने चाय बनाई, और रसोई से ही चिल्ला कर बोलीं- भाई साहब, चीनी लेते हैं या फीकी ?                     

2 comments:

  1. अपेक्षायें, उम्मीदें, ऐरर करैक्शंस - सही कहानी रही। लगभग इसी प्लॉट पर इब्ने इंशा की एक कहानी "बहादुर अल्लाह दित्ता" भी है।

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  2. aapne kahani ko padha, achchha laga. aapki jankari ke baad main kah sakunga ki maine ibne insha ko padha to nahin par unki tarah socha bhi hai. ab unhe padhoonga bhi. is parichay ka shrey aapko jata hai.

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