Tuesday, August 5, 2014

पहिये का खून

वो हज़ारों सालों तक धरती के भीतर पड़ा सड़ता रहा, मगर किसी ने भी उस पर ध्यान न दिया।  बल्कि धरती पर जो कुछ भी अवांछित, बेकार, और मैला होता वो सब जाकर उसी में मिल जाता। उसकी न किसी को ज़रुरत होती, और न याद ही आती।
इंसान तब अपने पैरों से चलता था। और पैरों में खून होता था। तो उसकी क्या ज़रुरत?
लेकिन पहिये का अविष्कार हो जाने के बाद इंसान को अपने पैरों से नापी दूरियाँ छोटी लगने लगीं। इंसान जहाँ अपनी बिसात हो, पैरों से जाता,और उसके आगे पहिये से।
कुछ समय बाद इंसान को लगा, कि पहिये में भी पैरों की मानिंद खून हो, तो और आगे तेज़ी से जाया जा सकता है।और तब धरती के नीचे दबे इस पेट्रोल की उसे याद आई। ये ही पहिये का खून बन गया।
खून सस्ता थोड़े ही होता है? न इंसान का और न पहिये का। लिहाज़ा इसके दाम बढ़ते गए।
अब इसके दाम रोज़ बढ़ते हैं।  कुछ लोग ये ही सोच के खुश होते हैं कि चलो,ये बेतहाशा दुर्लभ और कीमती हो गया तो इंसान दूर के ढोल बजाना छोड़ आसपास की सुधि लेना भी शुरू करेगा।
मगर बहुत से लोग इस बात से चिंतित भी रहते हैं कि पेट्रोल पहुँच से दूर हो गया तो कहीं हम वापस "कुए के मेंढक" न बन जाएँ।                

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