Wednesday, August 6, 2014

प्राण निकल गए

ऐसा बहुत ही कम होता है जब आपकी खींची लकीर आपसे बड़ी हो जाये।  मक़बूल फ़िदा हुसैन की सबसे मशहूर पेंटिंग के सामने खड़े होकर भी आप दांतों तले अंगुली तभी दबाते हैं, जब आपको बताया जाये कि ये हुसैन साहब का शाहकार है।
लेकिन दुनिया भर के करोड़ों बच्चे जब साबू और चाचा चौधरी को देखते हैं तो उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि इनके "चाचा" कौन हैं ? अर्थात इन्हें किसने बनाया है।
ऐसा करिश्मा तभी हो पाता है जब रचने वाले ने रचना में प्राण भरे हों।
हम-आप भले ही यह सोच कर उदास हो लें कि प्राण अब नहीं रहे, बच्चे तो उदास हो ही नहीं सकते, जब तक उनके बिल्लू,चाची,साबू और चाचा चौधरी उनके साथ हों। और वे हमेशा रहेंगे। उनके प्राण कभी नहीं निकल सकते।
शायद प्राण को मालूम था कि किसी के दिल से बचपन कभी नहीं जाता।  इसीलिए उन्होंने बचपन के इर्द-गिर्द लकीरें खींचीं।
मैं जब रज़िया सुल्तान फिल्म देख रहा था, तो अपने मन में सोच रहा था कि हेमा मालिनी [रज़िया] कभी किसी मुसीबत में नहीं पड़ सकती, क्योंकि उसके साथ उसका "साबू" है।          

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