Monday, August 18, 2014

सैर- सपाटा

 अलमस्त लहराकर बोलने की हमारी चाहत हमसे कई शब्द फ़िज़ूल बुलवाती है। घर-वर,खाना-खूना, रोटी-शोटी,मार-काट जैसे हज़ारों शब्द-प्रयोग हम रात-दिन कहते-सुनते हैं।
इनमें कई बार सार्थक संगत शब्द भी होते हैं, तो कई बार निरर्थक दुमछल्ले भी।
क्या आपने कभी सोचा है कि "सैर-सपाटा" हम क्यों बोलते हैं? सैर का सपाटे से क्या लेना-देना !
यह शब्द हिंदी को [हिंदी की पूर्ववर्ती भाषाओँ को] गणित ने दिया है।
चौंक गए न ?
आइये देखें-कैसे !
जब हम रोज़ाना में अपने घर में होते हैं तो तन-मन-धन से घर में होते हैं। हम जैसे चाहते हैं,वैसे रहते हैं।जो खाना है, खाते हैं, जो चाहते हैं पहनते हैं, जैसे चाहें रहते हैं।
घूमने-फिरने या भ्रमण के लिए निकलते ही कुछ परिवर्तन होते हैं।
हमें नई जगह की फ़िज़ा और औपचारिकता के तहत वस्त्र पहनने पड़ते हैं। जहाँ कुछ खर्च नहीं हो रहा था या कम हो रहा था, अब बढ़ जाता है। शरीर को कुछ आनंद मिलते हैं तो कुछ कष्ट।  मन और मूड भी बदल जाते हैं। खान-पान तो खैर बदलता ही है,घर में परहेज़ करने वाले बाहर चटखारे लेते देखे जा सकते हैं।
इन सारे परिवर्तनों का एक ग्राफ बना लीजिये। आप देखेंगे कि जमा पैसा घट गया है,खान-पान का अनुशासन घट गया है। मन का आनंद बढ़ गया है।  अर्थात तन-मन-धन का "गणित" हिल गया है। इस ग्राफ में कुछ घट कर नीचे गया है, और कुछ बढ़ कर ऊपर आ गया है। इस ग्राफ की लहर जैसी रेखा पहले से कहीं "सपाट" हो गई है।
सैर से यही सपाटा तो करके लौटते हैं आप !
                  

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