Thursday, March 6, 2014

रथ में घोड़े जोतने का समय

  भारतीय लोकतंत्र के रथ में जुते घोड़ों की  मियाद पूरी हो रही है।  मई के तीसरे सप्ताह के शुरू होते ही एक   ऐसी ताज़ा बयार आएगी जो इन कालातीत घोड़ों के भाग्य का फैसला कर देगी।
यह पहला मौका है जो  लोकसभा के चुनाव नौ चरणों में संपन्न होंगे।  अस्सी करोड़ से भी अधिक लोग इन चुनावों में मतदान करेंगे।  इस लम्बी कवायद के बाद देश को नई सरकार मिल जायेगी।
क्या होगा, यह तो चुनाव के बाद ही तय होगा, किन्तु "यदि ऐसा हो जाए" तो यह देश के भविष्य के लिए निश्चित रूप से बेहतर होगा-
किसी एक ही दल या गठबंधन को सरकार बना सकने लायक स्पष्ट बहुमत मिले ताकि संसद को मंडी बनने से रोका जा सके।
रथ का सारथी कोई ऐसी शख्सियत वाला नेता बने जो देश को अपनी नीतियां और इरादे अच्छी तरह समझा कर मैदान में आया हो, किसी जोड़तोड़ भरी लॉटरी में न निकला हो।
दिल्ली की  पूर्व राज्य सरकार के ऐसे अजूबे की  तरह न हो जो जिसके खिलाफ आग उगलता आये, उसी की  गोद में बैठकर [समर्थन से] शासन करना चाहे।
हम यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि ये सारे अस्सी करोड़ मतदाता दूध के धुले नहीं हैं, इन्हीं में अपराधी-भ्रष्टाचारी भी हैं, इन्हीं में लोभी-लालची भी,इन्हीं में अनपढ़ , इन्हीं में ढोंगी-दुराचारी भी, इन्हीं में नशाखोर, इन्हीं में टैक्स चोर-घूसखोर भी, इसलिए कुछ भी हो सकता है, लेकिन फिर भी अच्छा सोचने में क्या हर्ज़ है?
जो होगा, अच्छा ही होगा।          

2 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.03.2014) को "साधना का उत्तंग शिखर (चर्चा अंक-१५४४)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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