Thursday, March 27, 2014

थोड़ी देर और ठहर

सुबह का समय था. दो मुर्गे घूमने जा रहे थे. दोनों अच्छे मित्र थे, अक्सर ही चहलकदमी के लिए साथ-साथ निकल लिया करते थे.
चलते-चलते अचानक न जाने क्या हुआ कि एक मुर्गे ने अपना पर फैला कर अपने कान पर रख लिया. ऐसा लगता था मानो वह कुछ सुनना न चाहता हो. उसके मित्र ने इशारे से पूछा- क्या बात है, कान क्यों बंद कर लिए ?
वह बोला- अजीब-अजीब बेसुरी आवाज़ें आ रही हैं.
जहाँ एक मित्र ने कान बंद कर लिए थे, वहीँ दूसरा कानों पर ज़ोर डाल कर ध्यान से सुनने लगा कि बात क्या है. उसने सुना, बहुत सारे लोगों की  भीड़ की आवाज़ें आ रही थीं.सब एक दूसरे को भला-बुरा कह रहे थे, एक दूसरे की  निंदा कर रहे थे, एक दूसरे के लिए कड़वा बोल रहे थे.
वह बुद्धिमान था, सब समझ गया.वह अपने मित्र से बोला- घबराओ मत, ये तो लोगों की  आवाज़ है . वे सब अपना राजा चुन रहे हैं.
पहले मुर्गे ने आश्चर्य से कहा- अरे, यदि ये सब राजा चुन रहे हैं तब तो इन्हें और भी आदर के साथ सबके बारे में बात करनी चाहिए. ये तो सभी को कोस रहे हैं, और एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं, कल जब इन्हीं में  से एक इनका राजा बनेगा तो क्या इन्हें यह सोच कर शर्म नहीं आयेगी कि इन्होंने उसके बारे में क्या-क्या कहा था ? खुद उस राजा को कैसा लगेगा कि जो लोग आज सम्मान से उसे माला पहना रहे हैं, वे कल तक उसके बारे में क्या-क्या अनर्गल बोल रहे थे ?
कुछ नहीं होगा, तुम्हें पता है कमल के पत्ते इतने चिकने होते हैं कि उन पर पानी की  बूँद ज्यादा देर नहीं ठहरती. हाथ में कितनी भी कालिख लग जाए, साबुन सब धो देता है, हाथी दिन भर धूल-मिट्टी में घूमे, तालाब में नहाते ही साफ़ हो जाता है, झाड़ू कितनी भी गंदगी में जाए,झाड़ते ही फ़िर … भगवान की  भी मूर्ति जब बनती है, तो छैनी-हथोड़ा चोट मार-मार कर पत्थर का दम निकाल देते हैं, बाद में फिर सब उसी के सामने सिर झुका कर अगरबत्ती भी जलाते हैं.
मुर्गे को सब समझ में आ गया, उसने कान खोल लिए और आवाज़ों का आनंद लेने लगा.            
         

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