Monday, March 17, 2014

नए राज का जादू

जंगल में अफरा-तफरी मची हुई थी. राजा शेर अब उम्रदराज़ हो चला था, उससे जंगल का राज-काज अकेले सम्भलता न था.वह फैले कामकाज को निपटाने के लिए कभी भालू,कभी लकड़बग्घे,कभी भेड़िये,कभी चीते को साथ बैठा लेता था. लेकिन इससे भी पार न पड़ती थी. वे सभी मदद करने का भारी ईनाम तो लेते ही थे, साथ ही चोरी छिपे राजा के हिस्से का माल भी उड़ा जाते थे.और जनता में ये रौब भी गाँठते  थे कि वे राजा के साथी हैं.
धीरे-धीरे जनता में ये कानाफूसी होने लगी, कि पास के जंगल से कोई मज़बूत कद-काठी का दूसरा शेर लाकर उसे क्यों न राजा बना दिया जाये?
जैसे ही यह खबर फैली, राजा और उसके दरबारियों की नींद उड़ गई. और कोई चारा न देख कर राजा ने संन्यास लेने का फैसला मन ही मन कर डाला. दरबारियों में खलबली मच गई. उन्होंने जनता से कहना शुरू किया, कि चिंता न करें, हम कमउम्र के युवा राजा को गद्दी पर बैठा देंगे.परन्तु जनता को भरोसा न हुआ,उसे लगने लगा कि खूंखार दरबारियों से घिरा मासूम राजा भला जंगल को कैसे संभालेगा?
दरबारियों ने अपनी नैय्या डूबती देख एक नया पैंतरा बदला. वे जानते थे कि राजा की  दुर्दशा उनकी वजह से हुई है. वे सभी डूबती नाव से निकल-निकल कर भागने लगे.
लेकिन जनता अच्छी तरह जानती थी कि वे सब पिकनिक पर जा रहे हैं, शाम को फिर लौट आयेंगे.
जनता ने तय कर लिया कि इस खेल-तमाशे को अब हमेशा के लिए ख़त्म करना है.जंगल आखिर उसका अपना था, उसका ख्याल जनता क्यों न रखती ?   
             

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