Monday, September 1, 2014

सूरज का ठंडा टुकड़ा

एक बार जंगल में घूम रहे शेर से एक परिंदे ने पूछा- "क्यों भई , तू किस बात पर दहाड़ता रहता है, तेरे जबड़े दुखते नहीं ?"
शेर ने कहा-"मुझमें ताकत का घमंड है, मेरे स्वभाव में श्रेष्ठता की गर्मी है,मुझे अच्छा लगता है सबको अपनी उपस्थिति का अहसास कराना।"
पंछी बोला-"ये सब तो ठीक है, मगर याद रख, तू सूरज के टुकड़े पर रहता ज़रूर है, लेकिन वह अब ठंडा हो चुका है।"
शेर ने कहा-"तू जानता है न मैं कौन हूँ?"
-"हाँ,राजा है,पर मेरा नहीं, जानवरों का।" पक्षी ने लापरवाही से कहा।
-"तो तेरा राजा कौन है?"शेर ने आश्चर्य से कहा।
-"मोर !" परिंदा बोला।
शेर ने सोचा, इसके मुंह लगना ठीक नहीं,इसे मेरी कोई बात पसंद नहीं आएगी। वैसे भी,ये मेरा वोटर तो है नहीं! शेर अपने रास्ते पर बढ़ गया।           

5 comments:

  1. सटीक प्रस्तुति...

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  2. लगता है अब बिचारे मोर की जान खतरे में है ...

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  3. Shastra kahte hain ki Chauraasi laakh yoniyon ke baad Manushya-janm mil jata hai, Mor kee jaan jaane me bhi achchhai ye hai ki Manas-janm jaldi milega ! Aabhaar!

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  4. प्रबोध कुमार जी
    नमस्कार
    पहली बार आपको पढ़ा बहुत ही
    बेहद सटीक प्रस्तुति...

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