Thursday, September 11, 2014

ये अच्छा है

पिछले पूरे सप्ताह जम्मू-कश्मीर में जो विकराल तांडव चला, उससे निपटने में भारतीय सेना की तत्परता अत्यंत सराहनीय है। विपदाओं का आना तो किसी ढब रोका नहीं जा सकता,किन्तु सेना ने यह अवश्य जता दिया कि यदि धरती समस्याओं से भरी है, तो समाधानों से भी, ज़ज़्बों से भी और हौसलों से भी।
लगभग ऐसी ही विपदा की आहटें आज जापान से भी आ रही हैं। काश,कुदरत की उद्दंडता को वहां भी मुंहतोड़ जवाब मिले।
लेकिन कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि इस तरह जन-आपदाओं में सेना को उत्तरदायी बना कर झोंक देना उचित नहीं है।  ऐसे अवसरों, बल्कि कुअवसरों पर तो आपदा-प्रबंधन दलों और स्थानीय प्रशासनों को ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।
यह बात किसी भी देश,और विशेषतः विकासशील देश के लिए तो उपयोगी नहीं हो सकती। अन्य बचाव दल इंफ्रा-स्ट्रक्चर में सेना जैसे सज्जित और त्वरित नहीं हो सकते।उनके लिए प्रशिक्षण और सामानांतर सुविधाएँ जुटाना बेहद खर्चीला है। दूसरी ओर युद्धों का अत्यंत सीमित हो जाना सेना के अनुप्रयोग को भी तो सीमित करता है।  ऐसे में,यदि ऐसे विकट अवसरों पर सेना आम जनता के बीच मदद के लिए आती है तो एक ओर उसका अभ्यास बना रहेगा और दूसरे आम लोगों और सेना के बीच प्रगाढ़ परस्पर सौहार्द पूर्ण सम्बन्ध भी बनेंगे।  लोग देखेंगे कि कौन सीमा पर हमारा रक्षक है, और सेना के जवान भी जानेंगे कि हमने किस अवाम की हिफ़ाज़त को अपनी ज़िंदगी का सबब चुना है।  यह रिश्ता अच्छा है, पर भगवान करे कि इसकी ज़रूरत देश को कम से कम ही पड़े।             

2 comments:

  1. यह रिश्ता अच्छा है, पर भगवान करे कि इसकी ज़रूरत देश को कम से कम ही पड़े।
    बहुत सही सच ऐसी विपदा कभी किसी पर न आये ..यही प्रार्थना करते हैं

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