Saturday, September 20, 2014

"दस" बस है

कहते हैं कि गणित में एक क्या, शून्य यानी ज़ीरो भी बहुत है। फिर दस को कम कौन कह सकता है। दस तो बस है। दस में तो कुछ तूफानी किया जा सकता है।  कहने का मतलब है- डर के आगे जीत है!
तो जीत हो गई।  एकता की जीत, भाईचारे की जीत, मिलजुल कर रहने के ज़ज़्बे की जीत।
जीत ऐसे ही नहीं होती।  उसके लिए जीतना पड़ता है।  पिता को कहना पड़ता है कि बेटा, घर छोड़ कर मत जा, जो तू चाहेगा वही होगा। चार अंगुलियां होने पर ही मुट्ठी बनती है।मुट्ठी में ताकत होती है।  ताकत में हिम्मत होती है।  हिम्मत में गैरत होती है। गैरत में ही ज़िंदगी होती है।
आज समय बहुत बदल गया है। अब सूरज नहीं डूबना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती। सूरज अस्त होगा तभी तो सूर्योदय होगा। यदि सूर्यास्त ही नहीं हुआ तो सूर्योदय की सम्भावना कहाँ रह जाएगी। और सूर्योदय-सूर्यास्त को रोकने का अर्थ है ज़िंदगी को रोकना।  ज़िंदगी रोकने का मतलब है गैरत को रोकना।  हिम्मत को रोकना, ताकत को रोकना, बात घूम-फिर कर वहीँ आ जाती है।
तो अगर पैंतालीस प्रतिशत लोग कहें कि "अलग", और पचपन प्रतिशत लोग कहें कि "साथ-साथ", तो अंतर पूरा 'दस' का हुआ। और दस बस है।
बात यूनाइटेड किंगडम और स्कॉटलैंड की है।
हाँ,एक बात ज़रूर है।
अगर घर के पैंतालीस प्रतिशत लोग घर छोड़ने की मंशा रखते हों, तो घर के बुजुर्गों की नींद भी उड़ जानी चाहिए। चैन से तो हर्गिज़ नहीं बैठा जा सकता। क्योंकि अगर भगवान न करे,कभी दस प्रतिशत और गुस्सा हो गए, तो फिर कुछ भी हो सकता है। दस बस है।                         

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