Tuesday, September 9, 2014

इतने कठिन प्रश्न-पत्र नहीं बनाये जाते एक्ज़ामिनर महाशय !

आपने एक न्यायप्रिय राजा और दो स्त्रियों की कहानी ज़रूर सुनी होगी। दोनों स्त्रियों में एक ही बच्चे को लेकर विवाद हो गया। वे दोनों ही उसे अपना कहती थीं। जाहिर है कि बच्चे की माँ तो दोनों में से एक ही होगी, किन्तु दूसरी ने भी अपना दावा इस संवेदनशीलता से रखा कि बात बढ़ गई। यह तय नहीं हो पा रहा था कि बच्चे की असली माँ  दोनों में से कौन सी है। बच्चा भी इतना छोटा था कि अपनी वास्तविक माँ का कोई प्रभावी संकेत न दे सका। जटिल समस्या लोक-चौपाल से निकल कर राजदरबार में पहुँच गई।
बहुत प्रयास के बाद भी जब कोई फैसला न हो सका तो बुद्धिमान राजा ने घोषणा की कि बच्चे को काट कर आधा-आधा दोनों महिलाओं में बाँट दिया जाये। बस फिर क्या था,बच्चे की असली माँ तड़प उठी कि ऐसा न किया जाए, और बच्चा चाहे पूरा ही दूसरी महिला को दे दिया जाय। फ़ौरन दूध का दूध व पानी का पानी हो गया। नकली माँ दण्डित की गई, और बच्चा असली माँ को सौंपा गया।
ईश्वर इसी न्याय प्रियता से शायद और भी मसले सुलझाना चाहता है। उसने धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को दरिया की तरह मचलते हुए सैलाब में झोंक दिया। अब वह आसमान में बैठा देख रहा है कि  उसके दोनों दावेदार मुल्कों में से किस का दिल धड़कता है? बेचैनियां कौन से देश का खाना-खराब करती हैं? मदद और इमदाद के लिए कौन दौड़ता है? दुआ के हाथ किस जानिब से उठते हैं? और कौन फ़क़त तमाशाई बना रहता है?
जो भी हो, ईश्वर को ऐसे सख्त इम्तहान शोभा नहीं देते। भला कोई इंसान और इंसानियत को यों मुश्किल में डालता है?      
           

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