Tuesday, December 8, 2015

विपक्ष में हैं तो क्या?

इंदिराजी जब प्रधानमंत्री बनीं,उन्होंने शिक्षा मंत्रालय का नाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया। इसके पीछे सोच ये था कि यदि देश में शिक्षित लोगों की आबादी ४० प्रतिशत है, तो "शिक्षा"मंत्री केवल ४० प्रतिशत लोगों का न रहे, वह शत-प्रतिशत लोगों का ख्याल करे।  वे अनौपचारिक/दूरस्थ/मुक्त शिक्षा की भी पक्षधर थीं। 
देश का सौभाग्य है कि मौजूदा प्रधानमंत्री ने अपने पूर्ववर्तियों की हर "अच्छी" बात स्वीकारने की कोशिश की है.समाज के बीच लोकप्रिय और साधारण शिक्षित स्मृति ईरानी जी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय सौंपना भी ऐसा ही एक कदम था। अधिकांश उच्च शिक्षित लोग अशिक्षितों की समस्या समझ, उनके साथ न्याय नहीं कर पाते.
यह एक कठोर सत्य है कि यदि आप किसी खिलाड़ी को किसी काम की ज़िम्मेदारी देंगे तो वह सिद्धहस्त खिलाड़ियों के लिए ही सॉफ्टकॉर्नर रखेगा.यदि गैर-खिलाड़ियों की सही देखभाल चाहते हैं तो बड़े खिलाड़ी को यह काम मत दीजिये.
एक बड़े डॉक्टर जब स्वास्थ्यमंत्री बनाये गए तो उनके जेहन में डॉक्टरों का हित कौंध रहा था.वे आनन-फानन में सभी सरकारी डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति की आयु सत्तर वर्ष करने के कागज़ात तैयार कर बैठे.उनके लिए समूची व्यवस्था, बजट,अन्य पेशों के संभावित आक्रोश का मुद्दा गौण रहा.सर्व समावेशी प्रधान मंत्री ने तत्काल सरकार पर ये बोझ आने से रोका.
आप खुद सोचिये, यदि विधायकों-सांसदों के वेतन बढ़ाने का काम किसी गैर-सांसद/विधायक को दिया जाता तो ये इतनी तत्परता से बढ़ पाता ?
एक साधारण बस की कल्पना कीजिये.बस में बैठे मुसाफिर अंदर बैठे मुसाफिरों का ही पक्ष लेते हैं, बाहर खड़ों का नहीं.
इंदिरा जी मंत्री-परिषद का री-शफ़ल इसीलिए जल्दी-जल्दी करती रहती थीं.
         
  

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