Wednesday, December 30, 2015

राज़ जो दफ़न कर देगा ये जाता हुआ वर्ष!

सब जानते हैं कि महान संगीतकार ओ पी नय्यर और महान गायिका लता मंगेशकर में एक बार अनबन हो गयी थी। इसी अनबन ने नय्यर साहब को विवश किया कि वे अपने अधिकांश गाने आशा भोंसले से गवाएं।  संयोग से बनी इस जोड़ी के एक से एक नायाब नग़मे भुलाये नहीं जा सकते, क्योंकि आशाजी के सुरों की महानता भी किसी से छिपी नहीं है।
उस समय के तमाम कैबरे आशाजी के गाये गीतों पर ही होते थे।  कहने वाले कहते थे कि आशा भोंसले की आवाज़ का जादू केवल एक ही गायिका जगा सकती थी, स्वयं आशा भोंसले।
उस समय का बेहद लोकप्रिय गीत "आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ " जब अभिनेत्री बबिता पर फिल्माया गया,तब किसी ने लताजी के सामने कह दिया कि ये गीत केवल आशा भोंसले ही गा सकती थीं। मन ही मन लता जी इस बात को चुनौती की तरह ले बैठीं।
उन्होंने एक फिल्म में हेलन के लिए लिखे गए कैबरे गीत को भी खुद गाने की इच्छा जाहिर कर दी।  जबकि इस से पहले अनेक फिल्मों में आशा भोंसले ने कैबरे-नर्तकी के लिए, और उसी फिल्म में लता मंगेशकर ने नायिका के लिए लिखे गीत गए थे।
हेलन पर फ़िल्माया गया, लता का गाया यह नृत्य गीत "आ जाने जां ..."  इतना शानदार था कि निर्माता ने फिल्म की नायिका पर फिल्माने के लिए भी मदिरा के नशे में झूम कर गाया गया एक ऐसा ही गीत लिखवाया। गीत के बोल थे-"कैसे रहूँ चुप कि मैंने पी ही क्या है?"
फिल्म थी इन्तक़ाम और नायिका थीं साधना।
यह गीत इतना ज़बरदस्त हिट हुआ कि इसे "बिनाका गीत माला"ने, जो उस समय फिल्म संगीत का सबसे प्रामाणिक आइना मानी जाती थी,साल का सर्वश्रेष्ठ गीत चुना।
कहते हैं कि इस गीत से जिस तरह लता जी ने बहन आशा भोंसले का एकाधिकार तोड़ा,उसी तरह साधना ने बहन बबिता पर फिल्माए गीत का जलवा भी धुंधला किया।
एक संयोग इसे भी कह लीजिये कि ओ पी साहब की तरह साधना जी भी नय्यर थीं।
इस साल ने अपने साथ ले जाने के लिए जो लोग चुने उनमें अभिनेत्री साधना भी हैं।                       

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