Wednesday, November 13, 2013

क्या इस से डॉक्टर को असुविधा नहीं होगी?

एक बार कुछ युवकों ने एक पार्क में बैठकर शराब पी ली। संयोग से उनमें से एक को काफी नशा हो गया, और उसकी तबीयत भी बिगड़ने लगी। सभी मित्र घबरा गए।  नज़दीक ही एक मंदिर था।  युवक जानते थे, कि मंदिर में ईश्वर होता है जो इंसानों के कष्टों का निवारण किया करता है।  उन्होंने भी और कोई चारा न देख अपने साथी को मंदिर में ईश्वर की  शरण में ले जाने की  ठानी।  वे किसी तरह अपने मित्र को लेकर मंदिर के अहाते में पहुंचे।  मित्र की  आँखें नशे से लाल हो चली थीं, और वह रह-रह कर उल्टियां भी कर रहा था।  सभी युवक उसे सहारा देकर ईश्वर की  मूर्ति के समक्ष ले गए।  जल्दी और घबराहट के चलते युवकों को अपने मित्र के जूते उतारने का भी ध्यान न रहा।
भक्तों की  ऐसी मण्डली को देखकर पुजारी का माथा ठनका।  शराब के नशे में धुत्त युवक को देखते ही उसने क्रोधित होकर सभी को फटकारना शुरू किया और तुरंत बाहर निकल जाने का आदेश दिया।  युवकों के ज़िरह करने पर पुजारी ने कहा, अच्छा, तुम लोग आ सकते हो, मगर इस लड़के को बाहर निकालो, जिसने मंदिर को अपवित्र कर दिया है।
मित्र को अकेला न छोड़ वे सभी बाहर निकल कर मंदिर के मुख्य द्वार पर बैठ गए। कुछ समय बाद न जाने क्या हुआ कि अचानक पुजारी को ज़ोरदार दिल का दौरा पड़ा।  वह तड़पने लगा।
युवकों को उस पर दया आई, वे उठकर दौड़े और आनन-फानन में उसे उठाकर नज़दीक के एक अस्पताल में ले चले। पुजारी कृतज्ञ और विवश भाव से उन्हें देखता रहा।
जब वे अस्पताल के मुख्य द्वार पर पहुंचे तो एक मित्र ने कहा- पुजारी जी को यहीं छोड़ देते हैं, हमलोग भीतर डॉक्टर के पास चलते हैं।  पुजारी ने पूरी ताकत लगा कर कातर दृष्टि से उन्हें देखा और धीमी आवाज़ में कहा- फिर मुझे देखे बिना डॉक्टर मेरा इलाज़ कैसे करेगा?
-लेकिन आपको भीतर लेजाने पर तो डॉक्टर को असुविधा होगी न, आप बीमार हैं, आपका बदन पसीने से लथपथ मैला है, इसमें से गंध भी आ रही होगी।
पुजारी लड़कों का आशय समझ गया।  वह बेहद लज्जित भी हुआ।  उसने पश्चाताप करते हुए, नशे से त्रस्त उस युवक को देखा, जिसकी तबीयत अब तक काफी सुधर चुकी थी।       

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