Thursday, April 25, 2013

क्या आप जानते हैं कि "शहर" खुश कैसे होते हैं?

यदि आप थोड़ी देर के लिए आँखें बंद करके कल्पना कर सकें कि  कोई गिलहरी एक तालाब के किनारे घास में कुछ खाने योग्य ढूंढते-ढूंढते कीचड़ में फंसे हाथी के बच्चे को देखती है, और तत्काल उसकी मदद के लिए चिल्लाने लगती है, तो यह केवल आंतरिक ख़ुशी का मामला है।
संयोग से उधर से गुजरता कोई राहगीर हाथी के बच्चे को निकाल कर किनारे लगा देता है, तो यह भी सुख-संतोष की बात है। हाथी का बच्चा बच तो गया है, पर वह अब भी भयभीत है,और तालाब की ओर कातर दृष्टि से देखता, अब भी बिसूर रहा है।
गिलहरी हाथी के बच्चे को सामान्य बनाने के लिए कई तरह की मुख-मुद्राएँ बनाती है, और फिर उसकी पीठ पर चढ़ कर उसकी बगल में गुदगुदी करने लगती है। हाथी का बच्चा अब हँस रहा है। यह ख़ुशी है। तीनों के लिए- गिलहरी, राहगीर और हाथी के बच्चे के लिए।
यदि हम सब अपने शहर के निर्धन, बेसहारा लोगों को हाथी का बच्चा समझें, सरकार व प्रशासन को राहगीर समझें, और खुद को गिलहरी, तो हमारे शहर को खुश होने से कोई नहीं रोक सकता।
आपको गिलहरी कहने के लिए मुझे क्षमा करें।      

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (27 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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