Tuesday, April 23, 2013

राजसी हवा

एकदिन महल में बैठे राजा को अचानक अपने चापलूस लोगों से ऐसी ऊब हुई कि उसने "मुझे आज अकेला छोड़ दिया जाय" कह कर सभी को एक दिन की छुट्टी देदी।स्कूल छूटने पर बाहर भागते बच्चों की तरह दरबारी भी किलकारियां भरते हुए महल से निकल भागे।  
अपनी-अपनी रूचि और सुविधा से सभी राजधानी से बाहर घूमने को निकल गए।
घूमते हुए उन्होंने एक खेत देखा, जिसमें एक किसान हल चला रहा था। लोगों ने किसान से पूछा-"ये सारी ज़मीन किसकी है?"किसान ने कहा-"मेरी"
लोगों ने हैरानी से दांतों तले अंगुली दबाली। इतनी ज़मीन तो उनमें से किसी के पास नहीं थी।
लोगों ने पूछा- "यहाँ इतनी खुशबू कैसे आ रही है?"
किसान ने लापरवाही से कहा- "मैं क्या जानूं,शायद मिट्टी,पेड़ों,पानी,पंछियों और पवन से आती होगी।"
दरबारियों को गहरा अचम्भा हुआ,महल में तो जूही, बेला,चमेली, गुलाब, चन्दन,केवड़ा कितना मसल-छिड़क कर डाला जाता है,तब जाकर सांस आ पाती है।
लोगों ने पूछा-"तुम्हें किस को खुश कर के ये सब मिला, यहाँ राजाजी तो कभी नहीं आते!"
"अपने बैलों को, ये मेहनत से खुश होते हैं, मैं इन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मेहनत कराता हूँ।"किसान ने कहा।
लोगों ने पूछा-"यहाँ इतनी मेहनत से तुम्हें पसीना नहीं आता?"
तभी महल से एक  हरकारा दौड़ता हुआ आया और बोला-"चलो, सबको राजाजी बुलाते हैं"
वे सब पसीने से लथपथ हो गए और महल की दिशा में भागने लगे। हक्का-बक्का किसान उन्हें देखता रह गया।      

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