Monday, November 23, 2015

सहिष्णुता या असहिष्णुता आपके अपने भीतर है !

हवा न चले तो पतंग नहीं उड़ती, पतंग बेचने वाले भी मायूस हो जाते हैं।
हवा चले तो पतंग लहराती है। पतंगें उड़ें तो पेंच लड़ते हैं।
पेंच लड़ें, तो एक पतंग कटती है, एक काटती है।
कटने वाला मायूस,काटने वाले के मज़े।
हमेशा एक की ही पतंग कटे तो वह उड़ाना छोड़ देगा।
काटने वाले के मज़े भी ख़त्म! अकेला उड़ाता रहा तो ऊब कर वह भी उतार लेगा।
अतः मज़ा पेंच लड़ाने में ही है, हारने-जीतने में नहीं।
जीत जाएँ तो आनंद उठाइये, हार जाएँ तो जीतने का इंतज़ार कीजिये।
 
 


     
    


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