Thursday, November 26, 2015

प्रकृति मै 'म [ कहानी ]

अरे सर, रुटना रुटना ...अविनाश दौड़ता-चिल्लाता आया।
-क्या हुआ? मैं पीछे देख कर चौंका।
-सर, टन्सेसन मिलेडा।
-अरे कन्सेशन ऐसे नहीं मिलता।  मैंने लापरवाही से कहा।
-तो टेसे मिलटा है?
-उसके लिए प्रिंसिपल को सिगनेचर करने पड़ते हैं। मैंने समझाया।
-तो टर दो, आप ही तो हो।
-अरे बेटा, उस पर स्कूल की सील लगानी पड़ती है। मैं बोला।
-तो लडाडो न सर।
-सील यहाँ नहीं लाये। मैंने बताया।
-ट्यों नहीं लाये?
-चुप ! अब मुझे गुस्सा आ गया था।
-तो ठरीदो सबटे फुल टिटट ... अविनाश अब धीरे से बुदबुदा कर चुपचाप पीछे खड़ा हो गया।
मैं 'ज़ू' के मुख्यद्वार के पास बने बुकिंग कार्यालय की खिड़की पर जाकर स्कूली बच्चों के लिए टिकट लेने लगा। तब तक दो-दो, चार-चार के झुण्ड में बाकी बच्चे भी आकर इकट्ठे होने लगे थे।  चिड़ियों की तरह उनकी चहचहाने की आवाज़ें गूँज रही थीं।
ये सभी शहर के एक नामी पब्लिक स्कूल के नौ से बारह वर्ष की आयु के बच्चे थे जिन्हें दो-तीन अध्यापकों के साथ रविवार के दिन शहर का चिड़ियाघर दिखाने के लिए पिकनिक पर लाया गया था।  बच्चों में लड़के और लड़कियां दोनों थे, जो स्कूल बस से उतरने के बाद अपनी-अपनी मित्र-मण्डली में बंटे अध्यापकों के पीछे-पीछे आ रहे थे।
अविनाश विद्यालय का होनहार-समझदार बच्चा था, किन्तु तुतलाकर बोलने की आदत के कारण साथी लड़के उसका खूब मज़ाक बनाया करते थे।  यही कारण था कि वह साथियों से कटता था और ज्यादा समय या तो अकेला रहता था या फिर लड़कियों के साथ।  मजे की बात यह, कि लड़कियां उसे पसंद करती थीं और अपने साथ उसे रख कर खुश होती थीं क्योंकि एक तो वह बहुत सहयोगी भावना वाला था, दूसरे बुद्धिमान होने से उनका सलाहकार भी बना रहता था।  यों वह उम्र में बारह से कुछ ज्यादा ही रहा होगा।  अविनाश ने ही खुद आगे बढ़कर विद्यार्थियों को वहां कन्सेशन मिलने की बात  बताई थी।
[... जारी ]                  

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, २६/११ और हम - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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