Thursday, November 26, 2015

प्रकृति मै ' म [ कहानी- अंतिम भाग (5) ]

मैडम बोलीं- गौरव, बेटा इस ग्रुप में अब बहुत बच्चे हो गए हैं, तुम कल से दोपहर वाले बैच में आया करो।
गौरव ने मुंह में भरा पानी पिचकारी की शक्ल में ऐसे उछाला जैसे नौसिखुए सिगरेट पीने वाले धुआं एक ओर मुंह करके उड़ाते हैं।  फिर धीरे से बोला- जी मैम !
कोच उसके कॉस्ट्यूम की ओर गहराई से देखती हुई झेंप कर रह गयी।
गौरव ने चुपचाप पास की बेंच पर रखा अपना तौलिया लेकर कंधे पर डाला और धीरे-धीरे वाशरूम की ओर बढ़ गया।
मैं  शायद सीढ़ियों की ओर नीचे होने के कारण ऊपर उन लोगों को दिखाई नहीं दिया था लेकिन उनकी आवाज़ मुझ तक साफ-साफ आ रही थी।
बच्चे गौरव को जाते हुए देखते रहे, तभी पीछे से पानी के बीच से अविनाश की आवाज़ आई,जो गौरव से कह रहा था- ... तुम अब ठड़े होने वाले वाशरूम में जाना ...टल से.... ठीट है डौरव ?
बच्चों ने देखा गौरव मुस्कराकर पलटा और फिर बब्बर शेर वाली चाल से चलता हुआ शान से भीतर चला गया।  कोच ने मुझे देख लिया था और वे अभिवादन कर मेरी ओर चली आयीं।
मैं बच्चों को अठखेलियां करते देख रहा था कि तैरते हुए अविनाश की आवाज़ आई- डुरुजी ....नमस्टार !
मैं सोच रहा था, हम तो नाम के शिक्षक हैं बाक़ी असली शिक्षिका तो प्रकृति है जो अपने तरीके से ज़िंदगी के सबक हम सबको सिखाती है।  [ समाप्त ]
[ "सुजाता" सितम्बर 2015 अंक में प्रकाशित ]    

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