Wednesday, December 24, 2014

सबा से ये कहदो कि कलियाँ बिछाए

वो आ रहा है।  हम खुश हों, कि वो आ रहा है, या हम उदासीन हो जाएँ, वो तो आ रहा है।  क्योंकि वो हमारी नहीं, अपनी चाल से आता है, इसलिए हरबार आता है। इस बार भी आ रहा है।
भारत ने उसका स्वागत अपने दो रत्नों से किया है।  प्रतिक्रिया मिलीजुली है।  वैसे भी रत्न सबको कहाँ खुश कर पाते हैं? पहनने वालों को ख़ुशी देते हैं, तो देखने वालों को जलन!
रत्नों का उजाला सतरंगी प्रतिक्रियाएं जगाता है-
-देर से दिया है, बहुत पहले मिल जाना चाहिए था!
-ये तो इन्होंने दिया है, वो होते तो कभी न देते!
लगता है कि सुनार-जौहरियों की भी जातियां होने लगीं।  ये सुनार होगा तो उसे सोना कहेगा, वो सुनार होगा तो इसे सोना बताएगा। झंडों में लिपट गए दिमाग भी।  अब विवाद से परे कुछ भी नहीं।
हाँ,लेकिन ये निर्विवाद है कि वो आ रहा है। ये जाने वाला चाहे चुरा ले गया हो आँखों की नींदें, पर ये तय है कि  वो फिर लेके दिल का करार आ रहा है। क्रिसमस की हज़ारों शुभकामनायें!"मैरी क्रिसमस"     

    

4 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.12.2014) को "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" (चर्चा अंक-1839)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete

प्राथमिक उपचार है तुष्टिकरण

यदि दो बच्चे आपस में झगड़ रहे हों और उनमें से एक अपने को कमज़ोर पा कर रो पड़े तो हम उनमें फिर से बराबरी की भावना जगाने के लिए एक का तात्कालिक ...

Lokpriy ...