Thursday, February 28, 2013

न आणविक, न जैविक, सांस्कृतिक संक्रमण से है खतरा

  जब कोई देश आणविक परीक्षण करता है तो इसकी सफलता उस देश का हौसला बेतहाशा बढ़ा देती है। इसी तरह ऐसे परीक्षणों की विफलता भी मनोबल तोड़ने वाली होती है। यह ठीक ऐसा ही है कि  किसी पहलवान ने अखाड़े में आने से पहले ख़म ठोक करअपनी शक्ति का आभास करा दिया।  हमारे इतिहास की यह विश्वसनीय परम्परा है कि गरजने वाले बरसते नहीं।
यही किस्सा जैविक ताकत का भी है।  इस से होने वाला विध्वंस हमें होता दिखाई देता है, और हम समय रहते सचेत हो जाते हैं। इससे नुक्सान बड़ा नहीं होता।
हाँ, सांस्कृतिक अवमूल्यन की बात अलग है।  यहाँ हमारा परचम फहराता रहता है, हम बेफिक्र रहते हैं, और जड़ों में दीमक लग जाती है. एक दिन भरभरा कर सब गिर जाता है,और हमें कानों- कान खबर नहीं होती। क्योंकि जो मुट्ठी भर बुद्धिजीवी या चिन्तक हमें आगाह कर भी रहे होते हैं, उनकी आवाज़ नक्कार-खाने में तूती  की तरह ही होती है, जिन्हें हम अनसुना करके चल रहे होते हैं।       

Sunday, February 24, 2013

सूरज बड़ा क्यों है

कल कुछ देर एक ऐसे समारोह में बैठने का अवसर मिला जहाँ कई बड़े-बड़े विद्वान, लेखक, साहित्यकार और चिन्तक मौजूद थे. वहां किसी सन्दर्भ में यह सवाल उठा कि  जयपुर में आयोजित होने वाला लिटरेचर फेस्टिवल समाज के लिए कितना उपयोगी है? प्रश्न उठाने वाले विचारकों का कहना था कि इस फेस्टिवल को क्योंकि कई बड़ी-बड़ी मल्टी नेशनल कम्पनियां प्रायोजित करती हैं, अतः यह स्थानीय संस्कृति के अनुकूल नहीं होता.
वहीँ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल दुनिया भर में अत्यंत लोकप्रिय होता जा रहा है, और इसे पसंद करने वालों की बहुत बड़ी संख्या है, तो सोचिये, कि  आपको ऐसा क्यों लगता है.
यदि कोई बड़ी संस्था किसी आयोजन को सहायता देती है तो इससे आयोजन की श्रेष्ठता या व्यर्थता का कितना सम्बन्ध है? आप भी सोचिये.   

Saturday, February 23, 2013

आठ सौ पोस्ट पूरी कर देने की बेचैनी

मुझे किसी ऐसे आलोचक का इंतज़ार है जो मुझे साफ़ बताये, कि  ८ ० ० कदम चल कर अब इस यात्रा को रोक दिया जाए, या फिर ...कुछ दूर और !

गोश्त के बुलबुले

धरती पर आदमी बहुत समय से  है।  न जाने कब तक रहेगा। किसी को आपत्ति नहीं है, अनंत-काल तक रहे।
लेकिन कम से कम इस तरह तो रहे कि  उसके होने के अक्स मृत-आत्माओं की आँख की पुतलियों में तो न बनें। पर बन रहे हैं, कुछ लोग इसी तरह जीना पसंद करते हैं।
कुछ लोग भटक जाते हैं। वे जीवन की ज़मीन पर अपने दस्तखत करने के लिए दूसरों के लहू का इस्तेमाल  करते हैं। वह अपना सोच-राग गाने के लिए निर्दोष चमड़ी के ढोल मढ़ते हैं। वे दूसरों के तन की राख पर अपना बेहूदा तांडव करते हैं। वे अपने पैदा करने वालों और पालने वालों के लिए तामसी कलंक रचते हैं।
वे दुनिया के इतिहास में इस तरह याद किये जायेंगे, कि  हाँ, जीवन की बहती नदी में कुछ गोश्त के बुलबुले दिखे थे कभी।
हैदराबाद के ज़ख्म भरें, ऐसी शुभकामनाएं।

Friday, February 22, 2013

अर्धज्ञानेश्वर

अर्ध ज्ञानेश्वर माने नीम-हक़ीम।जिसे पता तो हो, पर आधा। हम ऐसे ही हैं।
हमें पता है कि  विदेशों में पैसा कैसे रख कर आते हैं, पर यह नहीं पता कि  वहां से वापस कैसे लाते हैं।
हमें यह तो पता चल जाता है कि  हमें विस्फोट का खतरा है, पर यह नहीं पता कि  इस से कैसे बचें।
हमें यह तो पता है कि  कीमतें कैसे बढायें, पर यह नहीं पता कि  महंगाई घटाएं कैसे।
हमें यह तो पता है कि  किसी को कुर्सी पर कैसे बैठाएं, पर यह नहीं पता कि  उतारें कैसे।
पर कहीं-कहीं हम समझदार भी हैं। हम जानते हैं कि  लोगों की याददाश्त बहुत छोटी होती है, वे जल्दी ही सब भूल जाते हैं। और फिर हम नई भूल करने के लिए आज़ाद हो जाते हैं।  

Thursday, February 21, 2013

विध्वंस होने पर सम्पादकीय लिखने का चलन

हैदराबाद में कई निर्दोष मारे गए या लहूलुहान हो गये। जो मरे, वे नहीं जानते थे कि उनका जीवन क्यों समाप्त किया जा रहा है।जो घायल हो गए, उनको यह अंदेशा नहीं था कि  आदमियों की बस्ती में भी शेर, भेड़िये या लकड़बग्घों  की तरह फैसले लिए जा सकते हैं।
जब किसी को कोई नया देश या प्रांत मिल जायेगा, तब कहीं से कोई फ़रिश्ता आकर उन मृत-आत्माओं से यह नहीं कहेगा, कि  चलो, हमारा काम हो गया,अब जी उठो।
फिर भी ऐसा नहीं है कि  हम कुछ कर ही न सकें, रस्ते तो कई हैं,हम सन्देश दें, सम्पादकीय लिखें, खेद प्रकट करें, आरोप-प्रत्यारोप लगाएं, उन बच्चों और विधवाओं से मिल आयें, जो अनाथ और बेसहारा हो गए। और यदि आस-पास चुनाव हो रहे हों, तो चंद मुट्ठी अशर्फियाँ ...क्षमा कीजिये, नोट बाँट आयें।  

हे ईश्वर, हमें शक्ति दो ताकि हम आलोचना करने से बच सकें

पिछले दिनों मैं अपने एक मित्र के घर बैठा था कि टीवी के कार्यक्रमों की चर्चा चल पड़ी। "लोग इन कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं लेते, इसलिए इनका स्तर भी गिरता जा रहा है", ऐसा कहने वाले एक सज्जन बता रहे थे कि  कुछ समय पहले तक वे एक चैनल बड़े शौक से देखते थे, लेकिन अब उन्होंने उसे देखना छोड़ दिया है। कारण  पूछने पर वे बोले- "वह चैनल ज़्यादातर एक ही हीरोइन की फ़िल्में और गाने दिखाता रहता है,जबकि उनमें कई तो ऐसी हैं जो बिलकुल चली भी नहीं थीं।"
एक अन्य मित्र बोले- "अरे भाई, वे तो फिल्म सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष हैं।"
एक अन्य मित्र बोले- "नहीं-नहीं, वह तो पहले भी ऐसे ही एक दूसरी हीरोइन की फिल्मों पर मेहरबान था, हमेशा उन्हीं की फ़िल्में और गाने दिखाता रहता था।" ऐसा कह कर उन्होंने उस हीरोइन का नाम भी लिया। 
मित्र  धीरे से बोले-"हाँ, तब वो सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष थीं।"
[आशा पारेख और शर्मीला टैगोर से क्षमा याचना सहित]

मैं जानता हूं कि...

 उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के ...

Lokpriy ...