Saturday, April 9, 2016

ये संवेदनशील मामला है

यह बात समय-समय पर अलग-अलग ढंग से उठती रही है कि एक ओर हम पेड़ों की अहमियत और उन्हें हर कीमत पर बचाने की बात करते हैं, दूसरी ओर दुनिया से कूच कर रहे इंसान के शव को कटे पेड़ों के आसन पर बैठा कर ही विदा करना चाहते हैं। हम विचार करें कि क्या हम अग्नि के और कई अधुनातन तरीकों पर विश्वास नहीं करते?
हम जानते हैं कि एक साधारण पेड़ औसतन बड़ा होने में तीन से पांच वर्ष का समय लेता है। वही पेड़ कट कर, सूख कर जब आग के हवाले होता है तो भस्म होने में तीन घंटे का ही समय लेता है। आबादी में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश इस रफ़्तार से अपनी हरियाली कब तक सहेज पाएगा?
यदि हम इसे श्रद्धा,परम्परा,धर्म का मामला मान कर इस परम्परा पर कायम रहना चाहते हैं तो यह नज़रिया और भी कई बातों में दिखना चाहिए, हम दीवाली के उजास को घी भरे मिट्टी के दीपकों से निकाल कर चकाचौंध बिजली की झालरों पर क्यों ले जाएँ? राम के लौटने पर हुई ढोल-ताशों की गड़गड़ाहट को बारूदी विस्फोटक आवाज़ों में क्यों तब्दील कर दें?  
आपका मन कह रहा है न, कि घी के दिए कैसे जलाएं, अब घी है ही नहीं, तो फिर भविष्य में पेड़ों के लिए भी यही कहने का मानस बनाइये।        

No comments:

Post a Comment

SAAHITYA KI AVDHARNA

कुछ लोग समझते हैं कि केवल सुन्दर,मनमोहक व सकारात्मक ही लिखा जाना चाहिए।  नहीं-नहीं,साहित्य को इतना सजावटी बनाने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं ह...

Lokpriy ...