Thursday, December 19, 2013

३५५ तेज़-रफ़्तार दिनों के बाद ये १० सुस्त-कदम दिन

मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि एक नए साल के आगमन की  उल्टी -गिनती फिर शुरू हो गई।  क्या सचमुच २०१३ जा रहा है?
मेरे इस आश्चर्य में एक बड़ा भाग तो पश्चाताप का है, कि मैं इस वर्ष लिए गए संकल्पों में से किसी का भी पालन ठीक से नहीं कर सका।  मुझे तो ये याद भी नहीं, कि मैंने क्या संकल्प लिए थे !
अब क्या हो?
क्या मैं बचे हुए १०-११ दिनों में ही ज़ोर शोर से उन संकल्पों को पूरा करने में जुट जाऊँ ?
या मैं इस तरह खामोशी से बैठा रहूँ, कि जैसे मैंने कोई संकल्प लिए ही नहीं थे।
अथवा मैं मन ही मन अपने आप से माफ़ी मांग लूं, कि मुझसे भूल हो गई।
या फिर मैं कोर्ट-कचहरियों के मुवक्किलों की तरह अथवा बैंकों के कर्ज़दारों की तरह अपना वादा पूरा करने की कोई नई तारीख पड़वालूं?
या फिर गंभीरता से यह सोचूँ,कि इस बार जो भी संकल्प लूँगा उसे ज़रूर पूरा करूँगा ?
नहीं तो चाँद सूरज पर ये लांछन ही लगाऊँ कि ये इतनी तेज़ी और नियमितता से भागते हैं कि वक्त यूँही गुज़र जाता है और कुछ हो ही नहीं पाता।
अब बंद करता हूँ, मेरा एक मित्र मुझसे सवाल कर रहा है कि मैं अपना समय कैसे काटता हूँ? 

2 comments:

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...