Tuesday, February 9, 2016

भटकते कोलम्बस

ये बात उस समय की है जब मैं मुंबई में था और अपनी कुछ कहानियों के सिलसिले में कभी-कभी फिल्म निर्माताओं से मिला करता था। मेरा एक मित्र परवेज़ ये मुलाकातें तय करवा देता था जो मेरे साथ ही रहा करता था।
एक दिन एक बड़े निर्माता से मिलना तय हुआ, जिनकी पत्नी भी उस समय बेहद मशहूर फिल्मस्टार थीं।  मैं अकेला ही उनके दिए समय पर उनके दफ्तर में मिलने पहुंचा। कुछ देर की साधारण बातचीत के बाद वे मुझे अपने घर साथ चलने के लिए कहने लगे। उनकी कार दरवाजे पर लगी थी,उन्होंने मुझसे गाड़ी में बैठने के लिए कहा और स्वयं दफ्तर के लोगों को कुछ समझाने लगे। गाड़ी में ड्राइवर था,मैं पीछे बैठने लगा। ड्राइवर ने जैसे ही नज़र पीछे घुमाई, और नमस्कार करने की मुद्रा में मुंह उठाया,मैं चौंक गया। लड़का बेहद स्मार्ट [ बल्कि खूबसूरत भी कह दूँ] और संभ्रांत था। मुझे लगा, उनका बेटा या परिवार का ही कोई सदस्य न हो। ख़ैर , वे बगल में एक छोटा सा बैग दबाये आये और मेरे साथ बैठ गए। गाड़ी चल पड़ी।
उनके बँगले पर पहुँचते ही गाड़ी की आवाज़ सुनकर एक दरबान लड़के ने दरवाज़ा खोला, कार रुकते ही एक और लड़के ने भीतर से आकर उनके हाथ से बैग पकड़ा। ड्रॉइंग रूम में मुझे बैठने का इशारा करके वे भीतर चले गए। एक लड़का तुरंत पानी लेकर आया और जाते-जाते धीरे से पूछ गया कि 'चाय में चीनी लेंगे न?'
अब मैं ड्राइवर लड़के की बात भूल गया था क्योंकि दरबान,बैग लेने वाला, और पानी लाने वाला लड़का भी उसी की तरह स्मार्ट, खूबसूरत, काम में तत्पर शायद बड़े घरों के ही लड़के थे।
मुझे प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ दामोदर खडसे की कहानी " भटकते कोलम्बस " याद हो आई जिसमें अपनी दुनिया ढूंढते बेरोज़गार युवाओं का मार्मिक चित्रण है।
थोड़ी देर के लिए मैं ये भी भुला बैठा कि मैं अपनी कहानी सुनाने यहाँ आया हूँ।                     

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