Sunday, February 21, 2016

क्या फायदा?

मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा कि आजकल फिल्मों के नाम में दो बातें बहुत तेज़ी से दिखाई दे रही हैं-
१. हिंदी फिल्मों के नाम अंग्रेजी में आ रहे हैं,
२.एक ही फिल्म के नाम को २,३,४, क्रम डाल कर दोहराया जा रहा है।
उनका कहना था कि क्या हिंदी में "संज्ञाएँ" चुक गयीं ? अब नए नाम नहीं बचे?
यदि हिंदी में नए नाम ख़त्म नहीं हुए हैं तो ऐसा करने से उन्हें क्या फायदा है?
आइये जानते हैं कि उन्हें क्या फायदा है?
१. भारत में कुछ राज्य केवल हिन्दीभाषी हैं, कुछ हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान रखते हैं, और इक्का-दुक्का ऐसे भी हैं जो हिंदी को अब भी मन से नहीं पसंद करते। लेकिन हिंदी फ़िल्में सभी जगह जाती हैं और देखी भी जाती हैं। ऐसे में कई फिल्मकारों को लगता है कि हिंदी की तुलना में अंग्रेजी नाम जल्दी लोगों का ध्यान खींच लेंगे। यदि हिंदी में ही "नए" नाम चुने जायेंगे तो हो सकता है कि अहिन्दी भाषी लोग उनसे अपरिचित भी हों। आपने देखा होगा कि अंग्रेजी में भी आसानी से न समझने वाला नाम होने पर उसके साथ हिंदी या फिर उसका अर्थ डाला जाता है। आज अधिकांश हिंदी फ़िल्में कई देशों में एक साथ रिलीज़ भी की जाती हैं। याद रखिये,फिल्मउद्योग किसी भाषा का स्कूल नहीं, उद्योग का मुनाफा-आधारित बाजार है।  
२.जब एक ही फिल्म का नाम दोहराया जाता है तो उसके पीछे पुराने नाम की "गुडविल" को भुनाने,पुरानी फिल्म के कथानक से उसका तारतम्य स्थापित कर देने, उसके नाम के पहले से हो चुके विज्ञापन का लाभ लेने जैसे कारण होते हैं। हमारा सेंसरबोर्ड भी एक निश्चित समय के बाद नाम को पुनः काम में लेने की अनुमति दे देता है। टाइटिल रजिस्ट्रेशन के नियम भी इसकी अनुमति देते हैं। एक अवधि के बाद कॉपीराइट भी समाप्त हो जाता है। इन कारणों से जनित आर्थिक पक्ष निर्माताओं को ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है।
ऐसा मत समझिए कि इस बात के लिए हमारी-आपकी हिंदी की कोई कमी ज़िम्मेदार है!                 
   

No comments:

Post a Comment

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...