Sunday, January 25, 2015

तंत्र तो तंत्र, गण भी

 गणतंत्र दिवस शुरू हो गया है।  कुछ घंटों के बाद राजपथ पर देश एक जीवंत हलचल का साक्षी बनेगा।  विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के सर्वोच्च नागरिक बेहद खास मेहमान के रूप में आज की रात दिल्ली में हैं।  कहते हैं कि "जब घर में हों मेहमान तो कैसे नींद आये",लिहाज़ा देश जाग रहा है। आज देश की हर खास महफ़िल में रतजगा है।  आज आँखों-आँखों में यूँ ही रात गुज़र जाने वाली है।
कई लोग पद्म पुरस्कारों से खेल रहे हैं।  कब मिलेंगे, किसे मिलेंगे, की औपचारिक सूची अभी आई नहीं है लेकिन "उसे क्यों मिला, इसे क्यों नहीं, इसे देर से मिला, मैं तो नहीं लूँगा,मुझे तो काफी पहले मिल जाना चाहिए था, अरे, मुझे क्यों दे रहे हो भाई, मेरा नाम सूची में क्यों नहीं गया"सब तरह के जुमले तथाकथित बड़े और महान लोगों से देश सुन चुका है।
देश का संविधान लागू हुए पैंसठ साल बीत गए। इस लिहाज से संविधान भी हमारा "वरिष्ठ नागरिक"हो चुका है। लेकिन यह आज भी किसी को नहीं पता कि इस संविधान में धर्म और जाति के बारे में क्या लिखा है।कोई नहीं जानता कि आरक्षण देने के पीछे कौन सी भावना थी। किसी को इस बात से मतलब नहीं कि ये संविधान भाषा के सवाल पर क्या कहता है।
लेकिन फिर भी आज ये सब बातें करने का समय नहीं है।  आदमी कैसा भी हो, उसके मरे पर तो रोया ही जाता है। कितना भी निकम्मा,नाकारा या अयोग्य हो, उसके जन्म पर तो बधाई दी ही जाती है।
अमर रहे गणतंत्र हमारा !
आखिर गीता,कुरआन,बाइबल,रामायण जैसे ग्रन्थ रोज़ तो नहीं लिखे जाते। और ऐसे महान किसी ग्रन्थ को अपनाने का दिन, हो न हो खास ही होगा ! इस खास दिन की खास मंगलकामनाएं !                

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