Saturday, July 6, 2013

पड़ौसी

वे दोनों पड़ौसी थे, उन्हीं की तरह झगड़ पड़े। पहले बातों में तू-तू-मैं-मैं हुई, फिर जोर-जोर से बहस होने लगी। वह गज़ब जोर से बोल रही थी- "सारे दिन बदबू आती रहती है, वह तो हम ही हैं, जो सह लेते हैं। कोई और हो तो सिर  में दर्द ही हो जाये।"
वह कौन सा कम था, तुनक कर बोला-"अरे जाओ-जाओ, सिर दर्द तो मेरे हो जाता है, सारे दिन तुम्हारी चख-चख से। "
वह बोली-"धमधम की आवाज़ आती रहती है, ऐसा लगता है जैसे भूकंप आ गया हो। धरती डोलती रहती है, पता नहीं क्या करते हो दिन भर घर में?"
-और तुम?मुझे तो ऐसा लगता है जैसे कहीं बाढ़ आ गई हो, पानी बेकार बहता रहता है" वह हाथ नचा कर बोला।
अभी उनकी महाभारत और न जाने कितनी देर चलती, पर तभी कुछ खटका सा हुआ। दोनों सहम कर चुप हो गए। शायद केयर-टेकर उन्हें दोपहर का खाना डालने आया था। "ज़ू" के कर्मचारी ने पहले बन्दर को फल और रोटी डाली, फिर बतख को काई की खिचड़ी डाल कर लौट गया।दोनों पड़ौसी बहस भूल कर अपने-अपने पिंजरे में लंच लेने लगे। आज ज़ू की छुट्टी थी, इसलिए दोनों पड़ौसियों के पास यही तो टाइमपास था, वरना दिन कैसे कटता?  

3 comments:

  1. सुन्दर कथा .... ऐसा कौन है जिसे अपने पडौसी से शिकायत न हो... पर वही उनका शौर -शराबा हो या कुछ और उन के एक दिन बाहर चले जाने से हमें दु:खी करता है ष

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