Saturday, January 2, 2016

व्याकरण कैसे बनता है?

एक सरोवर से कुछ दूरी पर एक नदी बहती थी।
एक दिन वहां बहती हवा को न जाने क्या सूझा,उन दोनों के बीच संपर्क-सेतु बन कर एक दूसरे के ख्याल आपस में वैसे ही पहुँचाने लगी, जैसे कभी गोपियों की बातें कृष्ण तक पहुँचाया करती थी।
नदी और सरोवर के बीच तार जुड़ गया और वे आपस में बातें करने लगे।
नदी ने कहा-"तेरे मज़े हैं, यहीं बना रहता है, अपने घर में, मुझे देख, मेरा कोई घर नहीं। पहाड़ से गिरती हूँ और सागर में मिल जाती हूँ।"
सरोवर बोला-"तेरा जल निर्मल है, बहता रहता है। मुझमें लोग कचरा डालते हैं तो सड़ता रहता है, तू उसे बहा कर साफ़ कर देती है।"
नदी बोली-"तेरे किनारे पर तेरे अपने रहते हैं, यहीं जन्मे, यहीं बस गए। तू कितना भाग्यशाली है?"
सरोवर ने उत्तर दिया-"भाग्यशाली तो तू है, तुझ पर बांध बनते हैं, इनके पानी से खेत तो हरे-भरे होते ही हैं, घर भी बिजली के उजास से भर जाते हैं।"
उनकी बातें किनारे पर खड़े दो बच्चे भी सुन रहे थे। एक बोला-"अच्छा, अब समझ में आया कि ग्रामर कैसे बनती है?"
दूसरे ने आश्चर्य से कहा-"क्या मतलब?"
पहला बोला-"मतलब सरोवर को पुल्लिंग और नदी को स्त्रीलिंग क्यों मानते हैं!"          

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रतीक :) वैसे झीलें, खाड़ियाँ, भूमिगत नदियां (एक्विफर, सिनॉट आदि), कूप (और कूप मंडूक भी), और सागर-महासागर भी हैं।

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  2. अरे रे, मेघदूत तो छूट ही गया, पुल्लिंग है। :)

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